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Jagdalpur : माओवाद के कमजोर पड़ते ही बस्तर में मनीष कुंजाम ने तेज की छठवीं अनुसूची की मांग

Fri, 30 Jan 2026 03:45 PM IST
जगदलपुर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, सुकमा

सुकमा जिले में सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के बाद बस्तर में माओवादी गतिविधियों के कमजोर पड़ने के बीच शुक्रवार को सुकमा जिले में आयोजित एक बड़ी जनसभा के दौरान छठवीं अनुसूची लागू करने की मांग एक बार फिर प्रमुखता से सामने आई। बस्तरिया राज मोर्चा के संरक्षक, पूर्व विधायक और कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व नेता मनीष कुंजाम के बयानों ने इस संवैधानिक मुद्दे को नई राजनीतिक धार दे दी है।

शुक्रवार को आयोजित इस सभा को संबोधित करते हुए मनीष कुंजाम ने कहा कि बस्तर वर्तमान में पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में शामिल होने के बावजूद आदिवासी अधिकारों का वास्तविक संरक्षण नहीं हो पा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि ग्रामसभाओं की सहमति केवल औपचारिकता बनकर रह गई है और निर्णय स्थानीय समुदायों की इच्छा के विपरीत लिए जा रहे हैं। इसी कारण बस्तर जैसे आदिवासी बहुल क्षेत्र में छठवीं अनुसूची लागू करना आवश्यक हो गया है।

सभा के दौरान कुंजाम ने आरोप लगाया कि कई इलाकों में फर्जी ग्रामसभाओं के माध्यम से पहाड़ियों, जंगलों और खनिज संसाधनों को निजी कंपनियों को सौंपने की प्रक्रिया अपनाई जा रही है। उन्होंने कहा कि पेशा कानून का उल्लेख तो किया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर उसका पालन नहीं होता। उनके अनुसार छठवीं अनुसूची लागू होने से प्रशासनिक और संसाधन संबंधी अधिकार सीधे स्थानीय स्वशासी संस्थाओं के हाथ में होंगे।

शुक्रवार की इस सभा में बड़ी संख्या में ग्रामीणों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों की मौजूदगी रही। वक्ताओं ने आशंका जताई कि माओवादी प्रभाव के कमजोर होते ही अब बस्तर की पहाड़ियों, जंगलों और खनिज संसाधनों पर सरकार और निजी कंपनियों की रुचि तेजी से बढ़ रही है। मनीष कुंजाम ने दावा किया कि सुकमा जिले के कोंटा क्षेत्र सहित कोंटा, सुकमा और छिंदगढ़ विकासखंड की कई पहाड़ियों में बहुमूल्य धातुओं की मौजूदगी के संकेत मिले हैं।

सभा में प्रस्तावित कोंटा–जगरगुंडा रेललाइन परियोजना का भी उल्लेख किया गया। कुंजाम के अनुसार इस परियोजना के पीछे भी खनिज संसाधनों की संभावनाएं एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती हैं। उन्होंने कर्रेगुट्टा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि जहां पहले नक्सल उन्मूलन के नाम पर बड़े सुरक्षा अभियान चलाए गए, वहां अब खनन की संभावनाएं तलाशे जाने की चर्चा है। छठवीं अनुसूची की मांग के साथ गैर-स्थानीय निवासियों के बीच फैल रही आशंकाओं पर भी सभा में चर्चा हुई। कुंजाम ने स्पष्ट किया कि इस संवैधानिक मांग का उद्देश्य किसी समुदाय को विस्थापित करना नहीं, बल्कि बस्तर की आदिवासी संस्कृति, जंगल, जमीन और संसाधनों की रक्षा करना है।    

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