बालोद जिले का कृषि विज्ञान केंद्र किसानों के लिए नई राह दिखा रहा है। यहां तैयार हो रहे कुसुम (अमेरिकन केसर) के बीजों की डिमांड अब न केवल छत्तीसगढ़ के जिलों से बल्कि हैदराबाद तक पहुँच गई है। वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. के. आर. साहू ने बताया कि बीते समय में तिलहन फसलों का उत्पादन घटा है, जिससे तेल की मांग पूरी करने के लिए देश को आयात पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में धान के बाद कुसुम की खेती किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती है। कुसुम का पौधा सूरजमुखी जैसा दिखता है और यह लाभकारी तिलहन फसल है। इसकी खेती में कम पानी की आवश्यकता होती है, इसलिए यह सूखे क्षेत्रों के लिए भी उपयुक्त है। उन्नत तकनीक के उपयोग से किसान इससे बेहतर आर्थिक लाभ कमा सकते हैं। कुसुम के फूल और बीजों से उच्च गुणवत्ता का तेल निकाला जाता है, जो हृदय रोगों के लिए रामबाण माना जाता है। डॉ. साहू ने बताया कि कई कंपनियां इस तेल का उत्पादन कर रही हैं और इसकी बाज़ार में मांग लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि बालोद का अमेरिकन केसर अब प्रदेश से बाहर भी लोकप्रिय हो रहा है। कुसुम के फूलों की कलियाँ केसर जैसी प्रतीत होती हैं, इसलिए इसे अमेरिकन केसर कहा जाता है। इसकी पत्तियाँ पौष्टिक और स्वादिष्ट साग के रूप में उपयोग होती हैं। इनमें प्रोटीन, वसा और विटामिन C भरपूर मात्रा में पाया जाता है। एक एकड़ खेती के लिए केवल 6–7 किलो बीजों की जरूरत होती है।