आपदा के कहर से सहमी केदारघाटी में जीवन चक्र फिर से गुंजायमान हो पाएगा? इस सवाल का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। गौरीकुंड से रामबाड़ा तक के हालातों को देखकर आंखों को यकीन नहीं हो रहा है कि यहां कभी लोगों की चहलकदमी भी हुआ करती थी।
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मैं और मेरा मित्र दिवाकर गैरोला गौरीकुंड पहुंचे। यहां पहुंचकर जहां भी नजरें गई, सिर्फ बर्बादी दिख रही थी। गुलदार कमांडो के एसआई डीके नब्याल ने बताया कि उन्होंने जंगलचट्टी में रात गुजारी है। जंगलचट्टी से गरुड़चट्टी चढ़ने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई।
गौरीकुंड में बारिश के दौरान कोई सो नहीं रहा है। कुछ ही दूरी पर हमें एक नेपाली मिला, उसने कहा कि लोनिवि ने गैती और दाल, चावल देकर हमें जंगलचट्टी भेजा, लेकिन वहां रहना मुश्किल है।
साफ नजर आ रही थी तबाही
अब हम मोरपानी पहुंचे। लोनिवि ने यहां रास्ता सिर्फ एक फिट का बना रखा है। यहां से हम पुराने ट्रैक से जंगलचट्टी पहुंचे। यहां कुछ दूरी पर छानियों पर बीस खच्चर थे। यहां से कुछ दूरी पर झरने के नीचे एक शव भी मिला, लेकिन वहां तक पहुंचना आसान नहीं है।
यहां से आगे बढ़ते हुए भीमबली के ऊपर हमें एक भैंस और एक कुत्ता फंसा मिला। भीमबली से पांच सौ मीटर की दूरी पर स्थित रामबाड़ा की तबाही साफ नजर आ रही थी।
रामबाड़ा बाजार पूरी तरह से साफ हो चुका है। यहां अब पानी का रेला और मलबा पटा हुआ है। यहां लोनिवि के गौरीकुंड से रामबाड़ा तक पैदल मार्ग खोलने के दावे खोखले नजर आए। भले ही बाद में विभागीय अधिकारियों ने भीमबली तक रास्ता खोलने की बात कही थी, लेकिन वह भी झूठी साबित हुई।
खाई में तब्दील
रामबाड़ा में जहां पूरा बाजार बसता था। वहां अब सन्नाटा पसरा है। पूरी तरह से खाई में तब्दील हो चुका है। चारों तरफ फैले सन्नाटे को बस बहते पानी के धारे चीर रहे हैं। यहां के वातावरण में दुर्गंध फैली है, जिसमें कुछ देर के लिए भी सांस लेना मुश्किल हो रहा है। यहां से हम वापसी के लिए खतरनाक रास्तों से होते हुए गौरीकुंड की तरफ निकले।
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