नगर के प्रमुख उद्योगपति लाला रामजी लाल यादव आज 99 वर्ष की उम्र में भी अपनी दिनचर्या सामान्य जवान की तरह जीतें हैं। इस बुजुर्ग ने 1936 में किच्छा आकर अपनी आंखों से सारा नगर बसता देखा है। वे किच्छा में बिजली लाने के लिए खुद दोहना से लोहे के खंभे लेकर आए थे।
एक मुलाकात में रामजी लाल यादव ने बताया कि वह वर्ष 1936 में किच्छा आए तो यह बियाबान जंगल में एक गांव था। आबादी के नाम पर मात्र 1000 से कम लोग थे। बताया कि देश पर अंग्रेजों का राज था। जिलाधिकारी और पुुलिस के ऊंचे पदों पर आसीन अधिकारी अंग्रेज थे, जबकि उनके नीचे काम करने वाले भारतीय होते थे। बताया कि खटीमा की ओर जाने वाली सड़क कच्ची और बरेली जाने वाली सड़क कंकरीट की हुआ करती थी।
पुरानी बातें याद करते हुए उन्होंने बताया कि आज जो गौला नदी किच्छा की पुरानी मंडी के बिल्कुल किनारे बह रही है यह नगर से लगभग एक मील दूर बहती थी। नगर में बिजली कब आई के सवाल पर बताया कि वर्ष 1950 के आसपास का समय था। उनके साथ नगर के कुछ लोग बिजली लाने के लिए प्रयास में लगे तो स्वयं वह बैलगाड़ियों से बरेली के दोहना से लोहे के खंभे लाद कर लाये और नगर में बिजली जलाई गई। बताया कि नगर के उत्तरी ओर हल्दू का विशाल जंगल था। रामजीलाल ने बताया कि वर्ष 1950 की बात होगी जब पाकिस्तान से रिफ्यूजी आये तो सरकार ने उन्हें जमीनें बांटी, तब जहां-जहां जमीन दी गई वहां-वहां सरकार ने मकान बनाकर गांव बसाए। बताया कि आजादनगर, चकौनी, मिलख, रमेशपुर, महाराजपुर आदि गांवों को अपनी आंखों से बसते देखा है। जब बीमारियां फैली तो सरकार ने आर्टीजन लगवाकर पीने के पानी की व्यवस्था की। चारों ओर बियाबान जंगल होने से शेर, हाथी आदि जंगली जानवरों का भय बना रहता था। लोगों में एक दूसरे के प्रति प्यार बहुत होता था। एक दूसरे पर परेशानी आने पर लोग सहयोग करते थे।