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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज्ञानी स्वर्ण सिंह नहीं रहे

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज्ञानी स्वर्ण सिंह। (फाइल फोटो) - फोटो : SITARGANJ
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ज्ञानी स्वर्ण सिंह का निधन हो गया। वह 102 वर्ष के थे। पखवाड़ा भर से अस्वस्थ थे। सोमवार रात करीब 11 बजे अपने आवास पर उन्होंने अंतिम सांस ली। राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनके पुत्र बलराज सिंह और कुलदीप सिंह ने चिता को मुखाग्नि दी। स्व. सिंह ने जहां अंग्रेजों की यातनाएं सहीं थीं, वहीं बंटवारे के दौरान मां को भी खो दिया था।
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ग्राम मैनाझुंडी निवासी ज्ञानी स्वर्ण सिंह का जन्म वर्ष 1919 में शेखपुरा पंजाब के भुट्टर गांव में हुआ था। 1942 के ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो’ आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई और अंग्रेजों की यातनाएं भी सही थीं। स्वर्ण सिंह 1945 में जालंधर और 1946 में पटियाला आए। वहां उन्होंने पंजाबी भाषा में शिक्षा ली। उन्होंने भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दौरान अपनी मां बाल कौर को भी खो दिया था। ज्ञानी स्वर्ण सिंह गुरुद्वारा श्री नानकमत्ता साहिब में रिसीवर भी रहे। उन्होंने तीन पुस्तकें भी लिखीं। स्वर्ण सिंह तो नहीं रहे, पर उनकी लिखी कविता... ‘कीति कुरबानी तू देश आजाद बदले, बनया समा पतंगा तू भगत सिंह’ सभी के दिलों में जिंदा रहेगी।
मंगलवार को गार्ड ऑफ ऑनर देकर राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि की गई। एसडीएम तुषार सैनी ने पुष्प चक्र अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। इस दौरान लोगों ने अश्रुपूरित आंखों से विदाई दी।
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वहां विधायक सौरभ बहुगुणा, पूर्व विधायक नारायण पाल, कांग्रेस प्रदेश सचिव नवतेज पाल सिंह, भुवन भट्ट, मालती विश्वास, भाईपाल सिंह, हरचरण सिंह, नरेंद्र बमराह, साहब सिंह बिजटी, मलूक सिंह आदि थे। इधर, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत व नानकमत्ता विधायक डॉ. प्रेम सिंह राणा, श्रम एवं रोजगार मंत्रालय भारत सरकार की सलाहकार समिति के सदस्य सुरेश गंगवार, पूर्व ब्लॉक प्रमुख बहादुर सिंह, पूर्व सांसद डॉ महेंद्र सिंह पाल ने भी शोक जताते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।
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