उत्तराखंड की लोक संस्कृति के वाहक ढोल-दमाऊं की थाप पर विधानसभा चुनाव का प्रचार अपने चरम पर रहा, लेकिन इस पौराणिक वाद्य यंत्र की सुध किसी ने नहीं ली। यहां तक कि 2012 से अभी तक के विस चुनाव में भी यह किसी पार्टी प्रत्याशी का मुद्दा नहीं रहा।
वर्ष 2008 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) बीसी खंडूड़ी ने ढोल-दमाऊं के संरक्षण के लिए गैरसैंण में ढोल-दमाऊं प्रशिक्षण केंद्र खोलने की घोषणा की थी, लेकिन लगभग डेढ़ दशक बाद भी यह घोषणा धरातल पर नहीं उतर पाई है। रंगकर्मी नवीन सेमवाल, जितेंद्र कुमार, जागर गायिका रामेश्वरी भट्ट आदि का कहना है कि भाजपा और कांग्रेस के नेताओं ने ढोल-दमाऊं को सिर्फ अपने पार्टी कार्यक्रमों, चुनाव प्रचार में नाचने मात्र तक रखा है।