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एम्स: ढीली पड़ी प्रशासन की लगाम, व्यवस्थाएं धड़ाम

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क8 एम्स में विभन्नि समस्याओं को लेकर बैठक करते नर्सिंग स्टाफ। - फोटो : RISHIKESH
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एम्स में अब तक स्थायी निदेशक की तैनाती न होने के चलते तमाम चिकित्सकीय और प्रशासनिक व्यवस्थाएं चरमरा गई हैं। इसका खामियाजा एम्स में इलाज के लिए आने मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। वहीं इससे एम्स के चिकित्सा शोध कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं। मौजूदा हाल यह है कि चिकित्सकों और कर्मचारियों के बीच आपसी सामंजस्य बिगड़ गया है।
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बीती 13 सितंबर को तत्कालीन एम्स निदेशक प्रोफेसर रविकांत सेवानिवृत्त हुए थे। इसके बाद 15 सितंबर को तीन महीने के लिए एम्स रायबरेली के निदेशक प्रो. अरविंद रघुवंशी को एम्स ऋषिकेश का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया था। अब 15 दिसंबर को प्रभारी निदेशक का कार्यकाल भी समाप्त हो गया है। इन तीन महीनों के दौरान एम्स में प्रशासन की पकड़ लगातार ढीली पड़ती चली गई। इसका नुकसान सीधा मरीजों को झेलना पड़ रहा है। आलम यह है कि वरिष्ठ चिकित्सक ओपीडी में मरीज देखने को तैयार नहीं हैं। कनिष्ठ चिकित्सकों के भरोसे एम्स की ओपीडी चल रही है। एम्स में भर्ती मरीजों को चिकित्सा सुविधाएं देने में लापरवाही बरती जा रही है। कई दिनों तक मरीजों की विभिन्न चिकित्सकीय ही जांच नहीं हो पा रही है। अस्पताल में बेड उपलब्ध होने के बावजूद मरीजों को इमरजेंसी से लौटाया जा रहा है। यही नहीं, निगरानी के अभाव में चिकित्सा शोध कार्य भी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं। पिछले तीन महीनों के दौरान एम्स ने केवल एक शोध कार्य जारी किया। इसमें कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था। सितंबर महीने में प्रभारी निदेशक के पदभार संभालते ही नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट के साथ मारपीट के मामले में नर्सिंग ऑफिसर डेवलपमेंट एसोसिएशन प्रशासन के खिलाफ मुखर हो गई थी। यह मामला राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा था। कई दिनों से चले विरोध प्रदर्शनों के बाद आखिरकार नर्सिंग सुपरिंटेंडेंट के साथ मारपीट के आरोपी पर पुलिस के मुकदमा दर्ज करने और एम्स प्रशासन के लिखित आश्वासन के बाद विवाद सुलझा था। अब एक बार फिर नर्सिंग ऑफिसर डेवलपमेंट एसोसिएशन ने विभिन्न मांगों को लेकर एम्स प्रशासन को आंदोलन की चेतावनी दी है। इन सबके बीच एम्स में वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ लगातार चिकित्सकीय और प्रशासनिक व्यवस्थाएं फिसलती जा रही है।
पूर्व कैबिनेट मंत्री को रात को छोड़ना पड़ा था एम्स
पूर्व कैबिनेट मंत्री मोहन सिंह रावत ‘गांववासी’ ने एम्स ऋषिकेश की अव्यवस्थाओं और कर्मचारियों के रवैये का हाल बयां किया था। एम्स की बदहाल चिकित्सा व्यवस्था से क्षुब्ध पूर्व कैबिनेट मंत्री ने रात 10 बजे अस्पताल छोड़ दिया था। उनका आरोप था कि सुबह इमरजेंसी में भर्ती के होनेेे के बाद उनको शाम को उनको जनरल वार्ड में भर्ती किया गया। एमआरआई की रिपोर्ट के लिए तीन दिन का इंतजार करने के कहा गया। जब उनकी पत्नी ने निजी वार्ड में भर्ती कराने का अनुरोध किया तो कर्मचारियों ने उनसे अभद्रता की। पूर्व कैबिनेट मंत्री ने यहे भी आरोप लगाया था कि उनको रात को कंबल तक नहीं दिया।
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कोविड नियमों के पालन से कोरोना नहीं फैलता
17 दिसंबर को एम्स ने एक शोध कार्य जारी किया गया। यह शोध पिछले साल दिसंबर महीने में शुरू हुआ था। शोध में बताया गया कि मास्क पहनने, सोशल डिस्टेंसिंग बनाने और हाथों को स्वच्छ रखने से कोरोना संक्रमण का जोखिम कम होता है। हैरानी की बात है कि जब देश के विभिन्न चिकित्सा संस्थानों में कोरोना के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन को लेकर शोध कार्य चल रहे हैं। वहीं एम्स ऋषिकेश अपने शोध में वह बात कह रहा है, जिसको आज देश का बच्चा-बच्चा जानता है।
एम्स प्रशासन के खिलाफ मुखर हुए नर्सिंग ऑफिसर्स
एम्स ऋषिकेश में नर्सिंग प्रोफेशनल डेवलपमेंट एसोसिएशन की ओर से एलटी-3 में बैठक की गई। इसमें एम्स के नर्सिंग ऑफिसर्स ने प्रतिभाग किया। बैठक में नर्सिंग ऑफिसर्स ने बीते दिनों एम्स ऋषिकेश में कार्यरत दिवगंत नर्सिंग ऑफिसर्स के लिए दो मिनट का मौन रखा।
रविवार को एनपीडीए के ज्वाइंट सेक्रेटरी दिनेश लोहार की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में एनपीडीए के अध्यक्ष प्रकाश चंद मीणा ने एनपीडीए एम्स ऋषिकेश के पंजीकरण से लेकर नर्सेज के उत्थान के लिए किए गए कार्य और एम्स ऋषिकेश में नर्सेज के वर्तमान मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि एम्स प्रशासन को एनपीडी एम्स ऋषिकेश की ओर से विभिन्न समस्याओं के समाधान को लेकर एक ज्ञापन सौंपा गया है। यदि एम्स प्रशासन नर्सेज की मांगें पूरी नहीं करता है तो वह आगे की रणनीति तैयार कर आंदोलन करेंगे। कार्यक्रम में उन्होंने अमित सैनी के नेतृत्व में पांच सदस्य समिति का गठन किया।
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इस मौके पर एनपीडीए के उपाध्यक्ष नागा श्रीकांत, उमेश शर्मा, एनपीडीए एम्स ऋषिकेश के कोषाध्यक्ष आशुतोष शर्मा और सुनील शर्मा आदि मौजूद थे। संवाद
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