पिथौरागढ़ के जंगलों में बंदरों की गणना करती वन विभाग की टीम।
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पिथौरागढ़। वन विभाग की टीम बंदरों की गणना के साथ मनुष्यों के बीच रहने वाले बंदरों और जंगल में रहने वाले बंदरों के स्वभाव को लेकर अध्ययन कर रही है। अध्ययन में ये बात सामने आई है कि मानवों के साथ रहने वाले और जंगलों में रहने वाले बंदरों के स्वभाव में काफी अंतर आ रहा है। अध्ययन में सामने आया कि जंगलों के मुकाबले शहरों में रहने वाले बंदर ज्यादा आक्रामक हो रहे हैं।
वन विभाग की टीम ने चंडाक, सोड़लेख, दिग्तोली, गुरना, थलकेदार सहित कई अन्य स्थानों पर टीमें बनाकर अध्ययन किया। सड़क के किनारे बैठे बंदरों के व्यवहार पर किए अध्ययन से पता चला कि लोगों के बंदरों को खाने का सामान देने से बंदरों के सामाजिक रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में बंदरों में फैसले लेने की भूमिका भी बदलती नजर आ रही है। जहां इंसानों से बंदरों को खाना मिल रहा है, वहां बंदरों का व्यवहार खतरों से भरा और आक्रामक हो रहा है। शहरों में बंदर लोगों के करीब पहुंचने का अधिक खतरा उठाते हैं। शहरी क्षेत्र के आसपास रहने वाले बंदरों का अपने समुदाय के बीच सामाजिक संबंध कम पाया गया।
जंगलों में रहने वाले बंदर एक-दूसरे का संवारना और सहलाने सहित अन्य कार्य करते नजर आए। जंगलों में रहने वाले बंदरों में कम आक्रामकता और बेहतर आपसी सामंजस्य देखा गया। बंदरों का ये व्यवहार काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि ये सामाजिक शिक्षा और संबंध निर्माण की नींव के रूप में कार्य करता है, जो एक मजबूत सामंजस्य पूर्ण समुदाय का नेतृत्व करते हैं लेकिन सड़क और आबादी के बीच पाए जाने वाले बंदरों में ऐसे व्यवहार की कमी थी। वह जंगलों में रहने वाले बंदरों से ज्यादा आक्रामक थे। जबकि जंगलों में रहने वाले बंदर अधिकतर समय जंगली फल-फूल खाने में और शोर से दूर रहने में व्यतीत करते हैं। संवाद
प्रदेश में आठ साल बाद हो रही है बंदरों की गणना
पिथौरागढ़। प्रदेशभर में आठ साल बाद बंदरों की गणना हो रही है। पहाड़ी क्षेत्रों में पिछले कुछ सालों में बंदरों की संख्या बढ़ी है लेकिन वन विभाग के पास कितने बंदर हैं इसकी जानकारी नहीं है। इसलिए गणना की जा रही है। संवाद
मानव बस्ती में रहने वाले बंदर मानव प्रेम के बावजूद ज्यादा आक्रमण हो रहे हैं। उनके सामाजिक स्तर भी बदलता नजर आया है। जबकि जंगल में रहने वाले बंदर शांत और बिलकुल भी आक्रामक नजर नहीं आ रहे हैं। इसके पीछे एक कारण शहरी क्षेत्र में खाने की कमी भी है। - दिनेश जोशी, वन क्षेत्राधिकारी पिथौरागढ़।