पिथौरागढ़। अंग्रेजी शिक्षा के दौर में हिंदी और संस्कृत भाषा की उपेक्षा देखी तो पिथौरागढ़ जिले के एक शिक्षक ने अपने प्रयासों से घर में ही संस्कृत पुस्तकालय खोल दिया। आज से 17 साल पहले खोले गए पुस्तकालय में वर्तमान में 50 हजार से अधिक पुस्तकें हैं। पुस्तकालय में हिंदी के साथ-साथ कुमाऊंनी साहित्य को बढ़ावा देने के लिए तमाम साहित्यिक गतिविधियां सतत चलती रहती हैं।
बजेटी निवासी डॉ. पीतांबर अवस्थी ने युवा पीढ़ी में अंग्रेजी भाषा के प्रति अधिक लगाव और हिंदी एवं देवभाषा संस्कृत के प्रति उपेक्षा देखी तो उन्होंने हिंदी-संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने की ठान ली। इसके बाद उन्होंने वर्ष 2003 में निजी प्रयासों से अपने मकान के दो कमरों में पुस्तकालय खोल दिया। ज्ञान प्रकाश नाम से खोले इस पुस्तकालय की शुरुआत 500 पुस्तकों के साथ हुई। इसके बाद युवा पीढ़ी में पुस्तकें पढ़ने का रुझान दिखा तो डॉ. अवस्थी का उत्साह भी बढ़ा। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि पांच सौ पुस्तकों से शुरू किए गए पुस्तकालय में सत्रह वर्षों में पुस्तकों की संख्या 50 हजार से अधिक पहुंच चुकी है। इनमें वेद, पुराण और उपनिषद ही नहीं देशभर के प्रमुख साहित्यकारों की हर तरह की किताबें उपलब्ध हैं। लेखन और पुस्तकालय को संवारने के लिए शिक्षक की नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले डॉ. अवस्थी अपना ज्यादातर समय पुस्तकालय में बिताते हैं।
डॉ. अवस्थी कहते हैं कि हिंदी हमारी मातृ भाषा है। संस्कृत देव भाषा होने के साथ-साथ उत्तराखंड राज्य की राजभाषा भी है। आज की पीढ़ी केवल अंग्रेजी के पीछे ही भाग रही है जबकि विश्व के तमाम देश ऐसे हैं जो केवल अपनी भाषा में ही बोलचाल सहित अन्य कामकाज करते हैं। वह कहते हैं कि हाशिये पर जा रही अपनी भाषाओं के प्रति हमारे भी कुछ दायित्व होने चाहिए। बताया कि हिंदी और संस्कृत भाषा के प्रति युवा पीढ़ी में लगाव बढ़ाने के लिए उन्होंने पुस्तकालय खोला है। डॉ. अवस्थी का कहना है कि लाइब्रेरी में नियमित काव्य और विचार गोष्ठियों के माध्यम से भी युवाओं में हिंदी साहित्य के प्रति रुझान पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
पुस्तकालय पर खर्च कर चुके 20 लाख से अधिक की राशि
डॉ. पीतांबर अवस्थी पुस्तकालय स्थापित करने से लेकर संचालन पर अब तक 20 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च कर चुके हैं। पुस्तकालय में पुस्तकों, समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के रखरखाव के लिए उन्होंने दो कर्मचारी भी नियुक्त किए हैं।
14 वर्षों से लगातार करा रहे काव्य और विचार गोष्ठियां
पुस्तकालय स्थापित करने के बाद साहित्य सृजन में जुटे डॉ. अवस्थी वर्ष 2007 से समसामयिक घटनाओं पर चर्चा, काव्य और विचार गोष्ठियों का आयोजन करा रहे हैं। इनमें नवांकुरों को मंच प्रदान किया जाता है। हिंदी के साथ-साथ कुमाऊंनी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए कुमाऊंनी काव्य गोष्ठी भी होती हैं।
11 पुस्तकें लिखी हैं, इनमें खंडकाव्य और काव्य संग्रह भी
डॉ. पीतांबर अवस्थी ने पंचप्रिया नाम से एक खंडकाव्य, परछाई काव्य संग्रह सहित अभियान एक दस्तावेज, बेटियां, जिंदगी जरूरी है, मासिक धर्म-अपवित्र क्यों, उत्तराखंड के परंपरागत जल स्रोत, हिमालय, पिताश्री के प्रिय भजन, स्तवनम के अलावा रोगनाशी जड़ी बूटियां विषय पर कुल 11 किताबें लिख चुके हैं।