पिथौरागढ़। सीमांत जिले में तेजी से बढ़ रहे जल संकट के बावजूद प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाने की मुहिम धरातल पर कहीं नजर नहीं आ रही है। नगर के अधिकांश जल स्रोत प्रदूषित हो चुके हैं। जल संस्थान ने इन स्रोतों के पानी को खतरनाक घोषित किया है।
जिला मुख्यालय में एक दर्जन से अधिक नौले-धारे हैं। एक दशक पूर्व तक नगर के लोग इन्हीं नौले-धारों से अपनी प्यास बुझाने के साथ ही अन्य जरूरतें पूरी करते थे। इन स्रोतों के स्वच्छ जल को किसी फिल्टर की भी आवश्यकता नहीं थी। बेतहाशा मकान बनने और घनी आबादी के चलते अधिकांश जल स्रोत दूषित होते गए। अधिकांश स्रोतों में सीवर होने की पुष्टि जल संस्थान की जांच में हो चुकी है।
नौले-धारों के साथ ही नगर में बहने वाले गधेरों के प्रति भी रवैया उदासीनता भरा ही रहा। यहां पुरानी बाजार स्थित शिवालय धारा, पांडेगांव, सेरा नौला, खड़कोट, चिमिस्या नौला, पदियाधारा, कौत का नौला समेत कई पेयजल स्रोत थे जिनका पानी पीने योग्य नहीं है। पदियाधारा और कोत का नौला का अस्तित्व समाप्त हो चुका है। जो बचेखुचे नौले हैं इनमें मजदूर तबके के लोग कपड़े धोते हैं।
गर्मियों में गहराता है पेयजल संकट
पिथौरागढ़। जिला मुख्यालय की आबादी लगातार बढ़ रही है। इससे गर्मियों के सीजन में पेयजल संकट गहरा जाता है। पंपिंग योजनाओं में विद्युत ब्रेकडाउन और अन्य तकनीकी दिक्कतों के चलते यदि दो-तीन दिन पानी नहीं आए तो नगर में हाहाकार की स्थिति हो जाती है। सौंदर्यीकरण के नाम पर नौलों में सीमेंट, टाइल को लगा दिया गया लेकिन जल स्रोतों को शुद्ध करने के लिए कोई कारगर उपाय नहीं किए गए। यदि समय रहते इन प्राकृतिक जल स्रोतों की तरफ ध्यान नहीं दिया गया तो एक दिन यह पूरी तरह विलुप्त हो जाएंगे। संवाद