थल (पिथौरागढ़)। श्री 1008 बालेश्वर महादेव का मंदिर रामगंगा नदी के पवित्र संगम के पूरब में स्थित है। त्रेता युग में इसी तट पर बानर राजा बाली ने 20 साल तक एक पैर पर खड़े होकर कठोर तप किया था। भगवान शिव इससे प्रसन्न हुए और बाली को बाल रूप में दर्शन देकर शिवलिंग में समाहित हो गए। स्वयंभू शिवलिंग की ख्याति से ही यह बालतीर्थ बालेश्वर कहलाया।
बालेश्वर मंदिर की स्थापना सातवीं सदी में कत्यूरी राजा के शासन काल में बलतिर गांव के सेरे में हुई थी। आज भी वहां भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश की मूर्ति के साथ सतयुगी पीपल का पेड़ साक्षी है। इसी बालतीर्थ से ही उस गांव का नाम बलतिर कहलाया। नौवीं सदी में इस मंदिर की स्थापना गोल गांव में हरि दत्त पंत इंटर विद्यालय के पास हुई।
पहले जोगियों का अखाड़ा थल पड़ाव में था जबकि जौरासी गांव में माई की कुटिया थी। इसलिए थल पड़ाव का असली नाम जोग्यूड़ा थल से भी जाना जाता हैं। अभिलेखों में यही नाम प्रयुक्त होता है। नौवीं सदी में थल के पास त्रिरथ नागर शैली से शिव-पार्वती की सुंदर कलाकृति के मंदिर का निर्माण किया गया था।
12वीं सदी में चंद राजा उद्योत चंद ने गोल गांव से मंदिर को बहुला और रामगंगा के तट पर स्थापित कर मंदिर के पुजारी कोटिगांव के ब्राह्मण परिवार में त्रिलोचन भट्ट को ताम्रपत्र देकर मान्यता दी। वहीं खोली गांव के ब्राह्मण उपाध्याय परिवार को मंदिर में पुरोहित की पदवी दी गई थी।
दर्शन मात्र से काशी के बराबर फल
थल (पिथौरागढ़)। उत्तर भारत में चार देवालयों में बालेश्वर मंदिर का नाम अग्रणी हैं। स्कंद पुराण में वर्णित श्लोक में इसकी महिमा में कहा गया है। यहां केवल दर्शन मात्र से ही काशी के बराबर फल प्राप्त होते हैं। वही माघ मास, विषुवत संक्रांति के दिन इस त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाकर और शिवलिंग का जलाभिषेक करने से मनुष्यों के सारे कष्ट, रोग, शोक, संताप नष्ट हो जाते हैं।
इसके घाट पर सद्गति करने से प्राणी को मोक्ष के साथ परमगति प्राप्त होती है। स्कंद पुराण के मानसखंड के 108वें अध्याय के 17वें श्लोक में श्री 1008 बालेश्वर महादेव के मंदिर की महिमा का वर्णन इन शब्दों में किया गया है- समर्च्य विधिवत्तत्र त्रियं प्राप्नोति मानव:, तत: क्रांतया जले पुण्ये बालतीर्थ मितिह स्मृतम, बालीश्वरस्य देवस्य पार्श्वे तीर्थोत्तमे शुभे, निमज्य मानवस्तल माघ स्नान फलं लभेत।