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शिवराज सिंह को राष्ट्रपति ने यूं ही नहीं भेजा संदेश

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हल्द्वानी। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का संदेश स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवराज सिंह को यूं ही नहीं आया। भारत छोड़ो आंदोलन में अंग्रेजों के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हें 19 कोड़े खाने पड़े थे, लेकिन देशभक्ति से प्रेरित और आजादी की लड़ाई लड़ने वाले जवां खून के फौलादी इरादों को अंग्रेज न डिगा सके, नतीजन उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। जवानी के दिनों में कई सालों तक दिन में एक समय का भोजन करते थे।
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अमरावती कालोनी निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिवराज सिंह फर्त्याल (96) मूलत: अल्मोड़ा जनपद के लमगड़ा ब्लाक के कपकोट ग्रामसभा निवासी हैं। नानतिन महाराज के अनन्य भक्त शिवराज को बुढ़ापे ने एक खटिया में सीमित कर दिया है। जब वह स्कूल पढ़ा करते थे तो उनके फौलादी इरादों को देखकर उनके साथी भी अचंभित रह जाते थे। हर भारतीय की तरह अंग्रेजों की गुलामी उन्हें भी पसंद नहीं थी। जीआईसी अल्मोड़ा में दसवीं में पढ़ते समय उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया। अंग्रेजों के खिलाफ बगावत करने पर तब उन्हें पकड़ लिया गया। उनकी छोटी उम्र देखकर उन्हें जेल में नहीं डाला गया लेकिन 19 कोड़े लगाने का हुक्म दिया गया। अंग्रेजों का दिल यहां भी नहीं पसीजा तो उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया। हालांकि एक साल बाद फिर वह स्कूल में दाखिल हुए और दसवीं की परीक्षा दी।
साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिवराज सिंह अक्सर अपनी बहू कमला और शुभचिंतकों को किस्से सुना दिया करते थे लेकिन अब उम्र बढ़ने के साथ उनका बोलना कम हो गया और सुनाई भी बहुत कम पड़ता है लेकिन इशारों में वह काफी कुछ कह जाते हैं। शिवराज सिंह के बड़े बेटे जितेंद्र सिंह बताते हैं कि हर साल उनके पिता को सम्मानित करने सरकारी अफसर बुला ले जाते हैं। बीते सोमवार को राष्ट्रपति का संदेश लेकर प्रशासनिक अधिकारी उनके घर आए थे और उन्हें सम्मानित किया था। शिवराज के एक बेटे केएस फर्त्याल कर्नल पद से रिटायर्ड हैं। सबसे छोटे डीपी सिंह कोलकाता में एक कंपनी में अधिकारी हैं। उनकी देखभाल उनके बड़े बेटे और बहू करती हैं।
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