जीवन रक्षक दवाओं का नशे में हो रहा इस्तेमाल घातक परिणाम ला रहा है। अगर नशा इंजेक्शन से लिया जा रहा है तो मौत निश्चित है।
ओपियाइड सेप्टीट्यूशन थैरेपी सेंटर (ओएसटी) की रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। ओएसटी में इंजेक्शन से नशा लेने वालों का इलाज होता है। सेंटर में इलाज करने पहुंचे 16 लोग एचआईवी (एड्स) संक्रमित मिले हैं। कई और लोगों में भी एड्स जैसे लक्षण मिले हैं।
भागदौड़ की जिंदगी में इंसान नशे के गर्त में डूब रहा है। कोई शराब तो कोई सिगरेट तंबाकू का नशा कर खुद को रिलेक्स महसूस करता है। युवा पीढ़ी नशे के मामले में दो कदम आगे है।
युवाओं ने चोरी छिपे जीवन रक्षक दवाओं को नशा का जरिया बनाया है। उत्तराखंड में दवाओं का नशा करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
इनमें भी इंजेक्शन से नशा करने वालों में युवा सर्वाधिक हैं। उत्तराखंड में जिन इलाकों में इंजेक्शन से नशा लिया जाता है वे जगह चिह्नित हैं।
इनमें हल्द्वानी का वनभूलपुरा क्षेत्र भी शामिल है। नाको की मदद से ऐसे इलाकों में ओएसटी खोले गए हैं, ताकि इंजेक्शन से नशा लेने वालों का इलाज कराया जा सके।
वनभूलपुरा सेंटर के डा. संजय गुप्ता बताते हैं कि इंजेक्शन से नशा लेने वाले 146 लोग सेंटर में पंजीकृत हैं। अभी 86 लोगों का इलाज चल रहा है।
सेंटर में इंजेक्शन से नशा करने वालों की लत छुड़ाई जाती है। इलाज के दौरान पीड़ित को इंजेक्शन के बजाए गोलियां दी जाती हैं।
गोली का नशा 36 घंटे तक रहता है। जबकि इंजेक्शन का नशा दो से पांच घंटे तक ही रहता है। इंजेक्शन का नशा करने से एड्स फैलने का खतरा होता है।
डा. गुप्ता के मुताबिक इलाज के दौरान 16 लोगों में एड्स मिला है। कई अन्य लोगों में भी एचआईवी संक्रमण के संकेत मिले हैं। इनमें अधिकतर युवा शामिल हैं। एड्स पीड़ितों का एसटीएच में इलाज चल रहा है।
हाथों की नस में इंजेक्शन लगाने में प्रशिक्षित नर्स तक धोखा खा जाती हैं। सालों से इंजेक्शन से नशा लेने वाले परफेक्ट हैं। सेंटर की नर्स सलोनी मसीह बताती हैं कि ऐसे लोग इंजेक्शन में दवा भरने के बाद पलक झपकते उसे नस में लगा देते हैं।
नशा करने वाले दर्द निवारक इंजेक्शनों का इस्तेमाल करते हैं। हर इंजेक्शन में एंटी एलर्जी दवा की डोज मिलाते हैं। इससे इंजेक्शन लगाने के बाद शरीर में किसी तरह का रिएक्शन नहीं होता है। दर्द निवारक दवा की 8 एमएल और एंटी एलर्जी की दो एमएल की डोज ली जाती है।
कई दवाएं बिना डाक्टर की सलाह के मेडिकल स्टोर से नहीं मिलती हैं। नशे के लिए यही दवाएं यूज होती हैं। वनभूलपुरा में कई घरों में प्रतिबंधित इंजेक्शन नशे के लिए बिकते हैं। इंजेक्शन की कीमत 20 रुपये है, जबकि ब्लैक में यह 70 रुपये का बिकता है।
सेंटर के परामर्शदाता सुनील कुमार बताते हैं नशे के आदी लोगों को जब इंजेक्शन नहीं मिलता है तो उसके दुष्परिणाम तत्काल दिखने लगते हैं। पेट खराब होने के साथ नाक और आंख से पानी टपकने लगता है। बेचैनी और शरीर में दर्द उठने लगता है। सेंटर में इसी का इलाज होता है।
नेशनल एड्स कंट्रोल आर्गनाइजेशन (नाको) ने हल्द्वानी के अलावा काशीपुर, रुद्रपुर, हरिद्वार और देहरादून में सेंटर खोले हैं। इनमें हल्द्वानी सेंटर सबसे पहले 2012 में खोला गया है। सेंटरों का चयन इंजेक्शन से नशा लेने वालों का सर्वे करने के बाद हुआ है।
शुरुआत में 10 एमएल के इंजेक्शन की डोज एक ही सिरिंज से दो से तीन लोग लगाते हैं। एक सिरिंज की कीमत 10 रुपये है। कई बार पैसे बचाने के लिए नशेड़ी फेंके सिरिंज को ही नशा करने के इस्तेमाल करते हैं। इससे एचआईवी संक्रमण फैलता है।