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स्वतंत्रता सेनानी का परिवार सड़क के लिए परेशान

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हल्द्वानी। सिस्टम की खराबी और सत्ता की अनदेखी के चलते स्वतंत्रता संग्राम सेनानी हरीदत्त कांडपाल के गांव कांडे (अल्मोड़ा) जाने वाली सड़क दो दशकों से नहीं बन सकी। इस मार्ग को बनाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी ने स्वीकृति दी थी। परिवार का आरोप है कि लोनिवि ने मार्ग बनाने के लिए ऐसा गलत प्रस्ताव दिया है, जिससे ऐतिहासिक पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण पहाड़ को काटना पड़ेगा। ग्रामीणों ने दिशा बदलकर वलना सुरईखेत से जोड़ने वाले मार्ग पर सड़क बनाने का अनुरोध किया लेकिन अधिकारी मानने के लिए तैयार नहीं हैं।
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द्वाराहाट कांडे गांव निवासी स्वतंत्रता सेनानी हरीदत्त कांडपाल जब 15 साल के थे, उसी समय उनके पिता पद्मादत्त कांडपाल की असामयिक मौत हो गई। पिता तंबाकू के व्यवसायी थे। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन के लेख से प्रभावित हरीदत्त कांडपाल ने पिता के निधन के बाद तंबाकू की जगह रानीखेत में कपड़े की दुकान खोली। आजादी के आंदोलन में शरीक होने के कारण 1930 में अंग्रेजी हुकूमत ने हरीदत्त कांडपाल को गिरफ्तार कर अल्मोड़ा जेल में बंद कर दिया था। इस जेल में स्वतंत्रता सेनानी का संपर्क पूर्व पीएम जवाहरलाल नेहरू, गोविंद बल्लभ पंत, हर गोविंद पंत से हुआ।
अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद करने पर 1932 में भी हरीदत्त कांडपाल को बरेली जेल में बंद कर दिया गया। इस जेल में समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया, लाल बहादुर शास्त्री, चौधरी चरण सिंह, आचार्य नरेंद्र देव जैसे सेनानियों से हरीदत्त कांडपाल की नजदीकियां बढ़ीं। 1940 में फिर हरी दत्त कांडपाल को गिरफ्तार कर बदायूं जेल में बंद कर दिया गया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने हरीदत्त कांडपाल को सीतापुर जेल में नजरबंद कर दिया था।
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स्वतंत्रता सेनानी का राजनीतिक सफर
आजादी के बाद 1952 में स्वतंत्रता सेनानी ने रानीखेत उत्तर विधानसभा सीट से हाथ आजमाया। चुनाव में हरीदत्त कांडपाल पांच मतों के अंतर से हार गए। पुनर्मतगणना में वह 105 मतों से आगे थे। परिवार का आरोप है कि प्रतिद्वंद्वी को पुनर्मतगणना से पहले विजयी घोषित कर दिया गया लेकिन जन समर्थन के चलते इसी विधानसभा से चुनाव लड़कर हरीदत्त कांडपाल 1957,1962,1967, 1969 में चार बार विधायक चुने गए। सुचेता कृपलानी सरकार में वे खाद्य, आबकारी, वन और परिवहन मंत्री रहे। राजनीतिक सफर पूरा करने के बाद स्वतंत्रता सेनानी 1974 में अपने गांव लौट आए और 24 सितंबर 1999 को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का निधन हो गया।
यह है मार्ग की समस्या की जड़
स्वतंत्रता सेनानी के पौत्र जेपी कांडपाल बताते हैं कि 2004 में एनडी तिवारी सरकार ने उनके नाम से सिमलगांव -सुरईखेत वाया ग्राम कांडे लिंक मार्ग स्वीकृत किया था। लोनिवि ने स्वतंत्रता सेनानी के घर के पीछे कच्चे पहाड़ के ऊपर सर्वे कराया। इस सड़क निर्माण के लिए निविदा आमंत्रित कर कटान कार्य शुरू किया जाना प्रस्तावित है। यह पहाड़ मुन्या ढाई पुरातात्विक महत्व का है। (पुरातत्ववेत्ता यशोधर मठपाल की पुस्तक द राक आर्ट ऑफ कुमाऊं हिमालयाज में इसका वर्णन मिलता है)। परिवार को आशंका है कि इस प्रकार सड़क बनने से पहाड़ के नीचे कच्ची चट्टानें खिसक कर गांव को तहस नहस कर सकती हैं। साथ ही गांव के प्राकृतिक पानी के स्रोत भी नष्ट हो जाएंगे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिवार और ग्रामीणों ने मोटर मार्ग का फिर पंक्तियोजन कर दक्षिण की ओर वलना-सुरईखेत मार्ग से मिलाने की गुहार लगाई है। इस मामले में ग्रामीण प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र भेज चुके हैं। फिर भी लोनिवि अधिकारी मार्ग की दिशा बदलने के लिए तैयार नही हैं।
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