हल्द्वानी। कुमाऊं-गढ़वाल के विभिन्न इलाकों से रानीबाग पहुंचे कत्यूरी वंशजों ने आराध्य और कुल देवी जियारानी की पूजा, अर्चना की। रानीबाग में गौला नदी में स्नान के बाद जियारानी की गुफा में पूजा कर रातभर जागर लगाया।
मकर संक्रांति से पहले दिन विभिन्न इलाकों के कत्यूरी वंशज अपनी कुल देवी और आराध्य देवी की पूजा के लिए रानीबाग आते हैं। आज मकर संक्रांति पर्व पर रानीखेत, द्वाराहाट, भिकियासैंण, लमगड़ा, बासोट (भिकियासैंण), धूमाकोट, रामनगर, चौखुटिया, पौड़ी आदि इलाकों से कत्यूरी वंशज बसों में भरकर रानीबाग पहुंचे। उन्होेंने गार्गी नदी में स्नान करने के बाद जियारानी की गुफा में पूजा की और रात्रि में जागर लगाया। कुल देवी से कष्ट निवारण की मनौती मांगी।
कत्यूरी वंशजों ने की कुल देवी जियारानी की पूजा
कुमाऊं-गढ़वाल के विभिन्न अंचलों से पहुंचे थे कत्यूरी वंशज
कत्यूरी वंशज बोले, पर्यटन क्षेत्र घोषित हो रानीबाग
कुल देवी की पूजा करने आए कत्यूरी वंशजों ने रानीबाग को पर्यटन क्षेत्र घोषित करने की मांग की। रानीबाग में हर साल कत्यूरी वंशजों के यहां पूजा के लिए आने के बावजूद प्रशासन की ओर से किसी तरह की व्यवस्था नहीं किए जाने से भी वह मायूस दिखे। सल्ट से आए चंद्रप्रकाश ने कहा कि हर साल कुल देवी की याद में यहां आते हैं। प्रशासन द्वारा कत्यूरी वंशजों के लिए किसी प्रकार की सुविधा नहीं दी जाती। न ठहरने की व्यवस्था है और न ही अलाव की। रानीखेत से आए प्रकाश सुयाल ने कहा कि रानीबाग से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं। कत्यूरियों के लिए यह पूजनीय स्थल है। इसे पर्यटक स्थल के रूप में घोषित किया जाना चाहिए। तल्ला सल्ट के गोपाल सिंह जिया रानी को कुल देवी के रूप में पूजते हैं। कहते हैं कि यह देवी हमारी रक्षा करती हैं। हमारे लिए यह आस्था और श्रद्धा का केंद्र है। भतरौंजखान से आए बालम सिंह ने कहा कि हम कत्यूरी राजाओं को पूजते हैं। उनकी याद में जागर लगाते हैं। जिया रानी यहां रहीं थीं, यह हमारे लिए हरिद्वार के समान तीर्थ है।
कत्यूरियों को निशुल्क भोजन
उत्तरायणी पर्व पर रानीबाग आने वाले सभी कत्यूरी वंशजों के लिए रात में निशुल्क भोजन की व्यवस्था की गई है। मेले में आने वाले लोगों को 14 जनवरी को प्रसाद के रूप में खिचड़ी बांटी जाएगी।
कत्यूरी मिलन 2019 आज
श्री रानीबाग तीर्थ क्षेत्र विकास अभियान की ओर से सोमवार को रानीबाग में कत्यूरी मिलन 2019 का आयोजन किया जाएगा। तीर्थ विकास अभियान की बैठक में कहा गया कि रानीबाग में आने वाले कत्यूरी वंशजों के भोजन, रात्रि विश्राम समेत अन्य व्यवस्थाओं को भविष्य में बेहतर बनाने के लिए विचार विमर्श किया जाएगा। बैठक में उद्योग भारती, नारायण चौधरी, कैलाश जोशी, संजय बल्यूटिया, पंकज खत्री, नवीन जोशी आदि थे।
कत्यूरी राजवंश की महारानी जियारानी रहीं थी रानीबाग में
हल्द्वानी। कत्यूरी राजवंश चंद्र राजवंश से पहले का था। कुमाऊं में सूर्य वंशी कत्यूरियों का आगमन सातवीं सदी में अयोध्या से हुआ। इतिहासकार इन्हें अयोध्या के सूर्यवंशी राजवंश शालीवान का संबंधी मानते हैं। इनका पहला राजा वासुदेव था। सबसे पहले वह बैजनाथ आया। इनका शासन उत्तराखंड से लेकर नेपाल तक फैला था। द्वाराहाट, जागेश्वर, बैजनाथ आदि स्थानों के मंदिर कत्यूरी राजाओं ने ही बनाए हैं। 47वें कत्यूरी राजा प्रीतम देव की महारानी ही जियारानी थी। प्रीतम देव को पिथौराशाही नाम से भी जाना जाता है। जिनके नाम पर पिथौरागढ़ नगर का नाम पड़ा। जियारानी का असल नाम मौला देवी थाष जो हरिद्वार के राजा अमर देव पुंडीर की दूसरी बेटी थी। अमर देव की पहली बेटी की शादी प्रीतम देव से हुई थी। 1398 में जब समरकंद का शासक तैमूर लंग मेरठ को लूटने के बाद हरिद्वार की ओर बढ़ रहा था, तब अमर देव ने राज्य की रक्षा के लिए प्रीतम देव से मदद मांगी। प्रीतम देव ने अपने भतीजे ब्रह्मदेव के नेतृत्व में विशाल सेना हरिद्वार भेजी, जिसने तैमूर की सेना को हरिद्वार आने से रोक दिया। इस दौरान ब्रह्मदेव की मुलाकात मौला देवी से हुई और वह उससे प्रेम करने लगा। अमर देव को यह पसंद नहीं आया। उसने मौला की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी प्रीतम देव से कर दी। मौला देवी को विवाह स्वीकार नहीं था। कुछ दिन राजा के साथ चौखुटिया में रहने के बाद वह नाराज होकर रानीबाग एकांतवाश के लिए आ गईं। माना जाता है कि वो यहां 12 साल तक रही। उसने सनेना की एक छोटी टुकड़ी गठित की और यहां फलों का विशाल बाग लगाया। इसी वजह से इस स्थल का नाम रानीबाग पड़ गया। एक बार रानी गौला नदी में नहा रही थी। उसके लंबे सुनहरे बाल नदी में बहते हुए आगे रोहिल्ला सिपाहियों को मिले। उन्होंने सुनहरे बाल वाली महिला की खोज शुरू की। उनकी नजर नहाते हुए रानी पर पड़ी। सैनिकों से बचने के लिए रानी पहाड़ी पर स्थित गुफा में छिप गई। रानी की सेना रोहिल्लों से हार गई और रानी को गिरफ्तार कर लिया गया। जब इसकी सूचना प्रीतम देव को मिली तो उसने अपनी सेना भेजकर रानी को छुड़ाया और अपने साथ ले गया। कुछ समय बाद प्रीतम देव का देहांत हो गया। उनका पुत्र दुला शाही बहुत छोटा था। इसलिए मौला देवी ने दुला शाही के संरक्षक के रूप में राज्य का शासन किया। पहाड़ में मां को जिया भी कहा जाता है। चूंकि मौला देवी राजमाता थीं, इसलिए वो जियारानी कहलाईं। रानीबाग में जियारानी की गुफा दर्शनीय है।
चित्रशिला का महात्म्य
नदी के किनारे एक विचित्र रंग की शिला है। जिसे चित्रशिला कहा जाता है। कहा जाता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु, शिव की शक्ति समाहित है। पुराणों के अनुसार नदी किनारे वट वृक्ष की छाया में ब्रह्मर्षि ने एक पांव पर खड़े होकर, दोनों हाथ ऊपर कर विष्णु ने विश्वकर्मा को बुलाकर इस रंगबिरंगी अद्भुत शिला का निर्माण करवाया और उस पर बैठकर ऋषि को वरदान दिया। कुछ लोग इस शिला को जियारानी का घाघरा भी कहते हैं।
दुर्घटना को दावत दे रहे हैं झूलते तार
हल्द्वानी। रानीबाग चित्रशिला मेला स्थल पर 33 केवी के झूलते बिजली के तार किसी भी वक्त हादसे का सबब बन सकते हैं। मेला स्थल में उत्तरायणी पर्व में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। सड़क किनारे दुकानें भी सजती हैं। स्थानीय लोगों ने ऊर्जा निगम के अधिकारियों से जल्द समस्या सुलझाने की मांग की है। वहीं, ईई डीके जोशी ने बताया कि शिकायत मिली है। एसडीओ को लाइन ठीक करने के आदेश दिए गए हैं। फिलहाल लाइन में करंट नहीं दौड़ रहा है।