प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में गरीबों को फिलहाल पर्याप्त दवाएं मिलना मुश्किल लग रहा है। सरकार इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है।
स्वास्थ्य विभाग न तो दवाओं की खरीद में दिलचस्पी दिखा रहा है और न ही नीति के संशोधन की कवायद की जा रही है। आलम यह है कि दवाओं की आपूर्ति करने के बजाय विभागीय अधिकारी दवा संकट को छुपाने की कोशिशों में जुटे हैं। इसके चलते अस्पतालों में दवाओं की आपूर्ति नहीं हो पा रही है।
सरकारी अस्पतालों में पिछले लंबे समय से दवाओं की कमी बनी हुई है। स्टॉक में ज्यादातर दवाएं खत्म हैं। हालांकि विभागीय अधिकारी दवा संकट की बात मानने को तैयार नहीं हैं, इसलिए मरीजों को वैकल्पिक दवाएं लिखी जा रही हैं। चिकित्सक मरीजों को वैकल्पिक या बाजार की दवाएं लिख रहे हैं।
बाजार से खरीद रहे लोग महंगी दवा:
वहीं दवा काउंटर से भी बड़ी संख्या में लोगों को बैरंग वापस लौटाया जा रहा है। निराश लोग बाजार से महंगी कीमत पर दवाएं खरीदने को मजबूर हैं।
विभागीय अधिकारी सब कुछ जानने के बावजूद मौन बैठे हुए हैं। प्रमुख सचिव स्वास्थ्य ओम प्रकाश और सचिव भूपिंदर कौर औलख भी दवा खरीद न होने की बात मान चुके हैं।
सीएमओ स्तर पर दवा खरीद न होने पर नाराजगी भी जताई गई है। हालांकि दोनों अधिकारियों समेत विभाग के अन्य अधिकारी भी दवा संकट से इंकार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब दवाओं की खरीद ही नहीं हुई तो अस्पतालों में दवा संकट खत्म कैसे हुआ।
स्वास्थ्य महानिदेशालय स्तर से दवा खरीद की प्रक्रिया चल रही है। सीएमओ स्तर से भी जल्द खरीद हो जाएगी। फिलहाल अस्पतालों में दवा संकट जैसी स्थिति नहीं है। जल्द ही आपूर्ति होते ही स्थिति में सुधार हो जाएगा।
-डा. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक