केदारघाटी में आया सैलाब तो गुजर गया लेकिन पीछे छोड़ गया तबाही के निशान। भजन कीर्तन और देव आराधना से गुलजार रहने वाली यह घाटी अब भांय-भांय कर रही है। न घंटे-घड़ियाल बज रहे हैं और न ही सुनाई दे रहा है अब कोई श्लोक।
यदि कहीं से कोई आवाज आ रही है तो वह कराहों और प्रलापों की है। इस सैलाब ने न सिर्फ केदारघाटी को तबाह किया बल्कि यहां रहने वाले स्थानीय लोगों की आर्थिकी भी तबाह कर दी है। उनके दुकान, होटल सब बर्बाद हो चुके हैं। घोड़े-खच्चर नदी में बह चुके हैं।
यात्रा सीजन ठप होने से अब पंडिताई और पुरोहिताना का काम भी बंद हो गया। सालभर के लिए परिवार के भरण-पोषण पर अब संकट मंडराने लगा है। आसपास के सड़क और पुल बह जाने से बाहरी क्षेत्रों से भी मदद की उम्मीद अब नहीं रही। केदार घाटी की स्थिति को देख महज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस घाटी को फिर से गुलजार होने में सालों लग जाएंगे।
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केदारनाथ से लेकर ऊखीमठ तक फैले केदारवैली के अधिकांश गांवों का संपर्क मार्ग तहसील मुख्यालय से कट चुका है। पुल-पुलिया के बह जाने से इन गांवों के लोगों को मुख्य बाजार तक पहुंचने को कई किलोमीटर पैदल चलकर जाना पड़ रहा है। दैवी आपदा के बाद राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक का सारा जोर केवल केदारनाथ घाटी में फंसे यात्रियों को निकालने पर रहा है। स्थानीय लोगों की दिक्कतों की ओर अब तक किसी का ध्यान नहीं गया है।
इस जल प्रलय से सर्वाधिक प्रभावित हुआ रुद्रप्रयाग-केदारनाथ मार्ग। इस मार्ग को बनने में कई साल लग जाएंगे। केदारनाथ से यात्रियों को लौटने के लिए बनाया गया रुद्रप्रयाग बाईपास भी गुलाबराय के पास बह गया। पुल भी बह गया है, जिससे बाईपास खत्म हो गया। वहीं मुख्य यात्रा मार्ग पर स्थित कुंड का पुल बह जाने से यह रास्ता बंद हो चुका है।
ऊखीमठ तहसील के गुप्तकाशी से लेकर तिरजुगी नारायण तक और कालीमठ की तरफ के सभी गांवों का तकरीबन यही हाल है। कालीमठ घाटी की तरफ कोटमा, कलूठा, कालीमठ, व्योंकी, कूड़जेठी, जाल तल्ला, जाल मल्ला, श्यांसू, चिलौंड, और रहेल गांव का संपर्क मार्ग भी बह चुका है। गुप्तकाशी और ऊखीमठ को जोड़ने वाला मंदाकिनी का पुल भी बह गया है। इस कारण लोगों को करीब 14 किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ रहा है।
कमोबेश यही स्थिति केदारनाथ राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित नाला, नारंगकोटी, कोठलादेवसाल, बांड़सू, त्यूड़ी, व्योमगाड़, मैखंडा, खड़िया, खाट, धानी, रविग्राम, सेरसी, बड़ासू, रामपुर, सीतापुर, तिरजुगीनारायण आदि गांवों का है। इस मार्ग पर अभी भी जगह-जगह भूस्खलन हो रहा है और बार-बार रास्ता बंद हो जा रहा है। पिछले दो दिन में ही दो बार फाटा के पास रास्ता बंद हो चुका है। घाटी की खूबसूरती पूरी तरह नष्ट हो चुकी है। सड़क पर जगह-जगह सिर्फ मलबे का ढेर ही नजर आता है।
दैवी आपदा से यात्रा सीजन तो खत्म ही हो गया। समय से पहले बारिश शुरू होने के कारण राशन भी जमा करने का मौका नहीं मिला। सभी रास्ते बंद हो जाने से अब आना जाना भी संभव नहीं है। अब तो हमारे सामने भुखमरी की समस्या आ जाएगी। वहीं क्षेत्र में न बिजली आ रही है और न ही घरों में कैरोसिन है।
कोठेडा के दिनेश पुरोहित
पुल जो बर्बाद हो गए
सोनप्रयाग का पुल, फाटा का नजदीक रेल गांव, कुंड (गुप्तकाशी और ऊखीमठ को जोड़ने वाला), विद्यापीठ का पुल
काकड़ागाड़ का पुल, भीरी, चंद्रापुरी, अगस्त्यमुनि, तिलवाड़ा
सड़कें जो चौपट हुईं
गुप्तकाशी से कालीमठ मोटर मार्ग, गुप्तकाशी से मयाली मोटर मार्ग, गुप्तकाशी से गौरीकुंड मोटर मार्ग, गुप्तकाशी से रुद्रप्रयाग मोटर मार्ग, गुप्तकाशी से ऊखीमठ मोटर मार्ग
केदार घाटी हुई वीरान, लौटने लगे खच्चर वाले भी
जल प्रलय के बाद केदारघाटी लगभग खाली हो गई है। हर तरफ सन्नाटा और जल प्रलय के निशान हैं। जिंदा बचे यात्रियों को जहां सेना ने निकाल लिया तो स्थानीय लोगों ने नाते-रिश्तेदारों के यहां जाकर शरण ले रहे हैं।
केदारनाथ के दर्शन कराने वाले घोड़े-खच्चर भी अब किसके लिए यहां रुकें। वे भी बचे हुए घोड़े-खच्चरों और परिजनों के साथ वापस अपने घर को चल पड़े हैं। झुंड के झुंड खच्चर इन दिनों सड़कों पर दिखाई दे रहे हैं। बताया गया कि इस बार स्थानीय प्रशासन ने 4500 खच्चर पंजीकृत किए थे। लेकिन सैकड़ों की तादाद में अवैध खच्चर भी संचालित थे। ढाई हजार के करीब पंजीकृत खच्चर वाले थे। लेकिन वास्तविक संख्या इससे ज्यादा थी।
वीरानी के बाद यह अंधेरा
पूरी केदारघाटी में जहां तबाही का मंजर है और हर तरफ वीरानी छाई हुई है। उसमें बिजली न होने से फैला अंधेरापन पूरे वातावरण को और डरावना बनाता जा रहा है। देर रात तक गुलजार रहने वाला गुप्तकाशी बाजार अब शाम ढलते ही वीरान हो जाता है।
हालांकि रविवार को गुप्तकाशी की बिजली व्यवस्था फौरी तौर पर की गई थी। सोमवार को बिजली रही भी लेकिन मंगलवार सुबह से ही गायब है। कब तक ठीक होगी, महकमे की ओर से इसका कोई भरोसा भी नहीं दिया जा रहा है।
वहीं आपदाग्रस्त रुद्रप्रयाग जिले के दो ब्लाक ऊखीमठ और अगस्तमुनि ब्लाक के करीब डेढ़ हजार गांव पिछले दस दिनों से अंधेरे में हैं। केदारनाथ के जल प्रलय में गुम हो चुके परिजनों की तलाश में दूर-दराज से आए लोगों को यह अंधेरा और डरा रहा है। वे दुबके हुए किसी दुकान की शटर से सट कर बैठे अपनी रातें काट रहे हैं। अंधेरे में जरा सी खरखराहट भी उनके अंतरमन को हिला कर रख दे रही है।
यहां मजहब की दीवार नहीं
हरिद्वार के मो. सलीम हों या नजीबाबाद के फुरकान, इब्राहिम और शरीफ, इन्हें केदारनाथ मंदिर तक आने-जाने और उनका दर्शन करने में कोई गुरेज नहीं है। इनके काम में न धर्म कभी आड़े आया और न धर्म के ठेकेदार। चारधाम यात्रा शुरू होने के साथ ही वे देश के कोने-कोने से आए हिंदू श्रद्धालुओं को बड़ी शिद्दत के साथ गौरीकुंड से केदारनाथ तक सभी देवी-देवताओं का दर्शन कराते हैं।
केदारनाथ के दर्शन के लिए गौरीकुंड से चलने वाले खच्चर-घोड़े ज्यादातर बिजनौर, हरिद्वार, नजीबाबाद के होते हैं। इनके मालिकान मुस्लिम समुदाय के हैं। इन्हें इस बात में कोई गुरेज नहीं कि हिंदुओं के तीर्थ स्थल पर ये आते-जाते हैं और यात्रियों को भगवान का दर्शन कराते हैं।
मजहब और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले भी यहां इन्हीं खच्चर वालों की मदद लेकर भगवान केदारनाथ का दर्शन करने पहुंचते हैं। इन खच्चर वालों का यही रोजी-रोजगार है। केदारनाथ के दर्शन करने आने वाले यात्रियों के लिए ये गाईड का भी काम करते हैं। चार महीने की यही कमाई उनकी और उनके परिवार के सालभर के भरण-पोषण का जरिया है।
यह इनका व्यवसाय है। यही कारण है कि इस व्यवसाय को वे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहे हैं। फुरकान अपने दस साल के बच्चे को भी इस व्यवसाय से जोड़ चुके हैं। वह भी इस बार खच्चरों के साथ केदारनाथ आया था। ऐसे ही अन्य कई कम उम्र के बच्चे इस बार खच्चरों से श्रद्धालुओं को भगवान केदारनाथ जी का दर्शन करा रहे थे। लेकिन 15 और 16 जून को केदारघाटी में आए जलजले ने न सिर्फ इनकी रोजी-रोटी छीन ली, बल्कि पूरे व्यवसाय को ही चौपट कर दिया। केदारनाथ के जल प्रलय की चपेट में ढाई से तीन हजार घोड़े-खच्चर आए। एक खच्चर की कीमत करीब एक लाख रुपये है। एक व्यक्ति पांच से दस खच्चर लेकर आया था। अब दो-चार ही बचे हैं।