उत्तराखंड सरकार बचाने और गिराने की लड़ाई में किसे क्या मिला, यह तो समय ही बताएगा, लेकिन नौ विधायकों के बागी होते ही कांग्रेस के भीतर की गुटबाजी दूर हो गई। जिनके दिल नहीं मिलते थे वह बगलगीर हो गए और हरीश रावत के साथ कदमताल करने लगे।
सरकार में मंत्री रहते हुए डा. इंदिरा ह्दयेश को हमेशा हरीश रावत का प्रतिद्वंद्वी माना जाता रहा। समय समय पर अलग-अलग मुद्दों को लेकर इंदिरा कायदे से टकराव मोल लेकर हरीश को असहज करती रही, लेकिन जब कांग्रेस टूटी तो इंदिरा ने हरीश का हर कदम पर साथ ही नहीं दिया, बल्कि लिखा पढ़ी का पूरा जिम्मा उन्हीं के पास रहा। यशपाल आर्य भी कुछ इसी तरह से पेश आए।
हरीश से दिल नहीं मिलने के कारण उनकी राह भी अलग ही रहती थी। उनके कोप भवन में जाने की खबरें अक्सर आती रही, लेकिन जब विद्रोह हुआ तो वह हरीश के साथ खड़े हो गए। प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय हर तीसरे दिन एक चिट्ठी लिखकर सरकार को असहज करते रहे, लेकिन इस वक्त उन्होंने पूरा मोर्चा संभालकर हरीश रावत को मदद ही की।
विनियोग विधेयक भी है राष्ट्रपति शासन की जड़ में
तो क्या 18 मार्च को विधानसभा में सदन की कार्यवाही भी राष्ट्रपति शासन का आधार बनी? वित्त विनियोग विधेयक के पारित होने और न होने को लेकर फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। इतना तय है कि यह मामला संविधान को लेकर बहस का हिस्सा जरूर बन सकती है।
विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल का दावा है कि वित्त विनियोग विधेयक सदन में ध्वनिमत से पारित हो गया था। कांग्रेस के विकासनगर विधायक और पूर्व मंत्री नवप्रभात का कहना है कि वित्त विनियोग विधेयक पर मत विभाजन मांगा ही नहीं जा सकता। जबकि संविधान विशेषज्ञों की राय है कि मतविभाजन अगर मांगा जाए तो अध्यक्ष को वोटिंग करानी होगी। इतना तय है कि वित्त विनियोग विधेयक अगर पारित न हो पाए तो सरकार पर अविश्वास के समान ही है। फिलहाल यही माना जा रहा है कि विधेयक पारित हो चुका है।
राज्य के बजट का सबसे बड़ा भाग है समेकित निधि। राज्य सरकार इसी निधि से अपने समस्त लेन-देन करती है। विनियोग विधेयक में इसी निधि के लेन देन को दर्शाया जाता है। विधि विशेषज्ञों के मुताबिक विनियोग विधेयक को पास कराना विधानसभा अध्यक्ष की जिम्मेदारी है और यह उनका सबसे बड़ा कर्तव्य है। 18 मार्च को विपक्ष ने वित्त विनियोग विधेयक पर मत विभाजन मांगा था। इस विधेयक को सदन के पटल पर रखने से पहले विभागों की अनुदान मांगों को सदन के पटल पर रखा गया। खुद उस समय मंत्री रहे हरक सिंह ने अपने विभागों से संबंधित अनुदान मांगों को पास कराया था।
वहीं संविधान इस बात पर भी स्पष्ट है कि अनुदान मांगों पर विपक्ष कटौती का प्रस्ताव ला सकता है, लेकिन वित्त विनियोग विधेयक पर सिर्फ चर्चा की जा सकती है। 23 मार्च को विधानसभा को भेजे गए अपने संदेश में राज्यपाल ने भी साफ कहा था कि भाजपा के 26 और कांग्रेस के नौ सदस्यों ने दावा किया है कि वित्त विनियोग विधेयक पर मत विभाजन मांगा गया था, लेकिन स्पीकर ने इसकी अनदेखी की।
इनका यह भी दावा था कि जिस समय वित्त विनियोग विधेयक पारित किया गया, उस समय सदन में कांग्रेस सरकार का बहुमत नहीं था। राज्यपाल ने अपनी तरफ से वित्त विनियोग विधेयक पर कोई बात नहीं की। केंद्र ने राष्ट्रपति शासन का आधार स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह पहली बार हुआ कि वित्त विनियोग विधेयक पारित कराते समय सदन में सरकार के पास बहुमत नहीं था। कांग्रेस विधायक नवप्रभात के मुताबिक यह संविधान बहस का विषय बनेगा।