हरिद्वार धर्मसंसद में भड़काऊ भाषण मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने प्रदेश सरकार से 10 दिन में जवाब मांगा है। फिलहाल इस मामले पर सरकार और सिस्टम में सन्नाटा पसरा है। मुख्यमंत्री कार्यालय का कहना है कि कोर्ट के आदेश का अध्ययन करने के बाद सरकार अपना पक्ष रखेगी। इधर, जानकारों का मानना है कि इस पूरे मामले में सरकार और सिस्टम की ओर से लेटलतीफी की गई।
धर्मसंसद में भड़काने वाले भाषण के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए। पुलिस ने तत्काल इनका स्वत: संज्ञान नहीं लिया। इस दौरान विवाद गहराया तो पुलिस मुख्यालय से मामले में कार्रवाई के निर्देश दिए गए। दो दिन बाद प्राथमिक जांच हुई। फिर डीआईजी गढ़वाल का बयान आया कि प्रकरण पर विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित कर दिया गया है। लेकिन एसआईटी बनाने का लिखित आदेश तीन दिन बाद हुआ। इस लेटलतीफी के चलते सरकार की मंशा पर सवाल भी उठे। विपक्ष ने इसे मुद्दा बनाया। शासन के स्तर पर इस पूरे मामले में यही कहा गया कि पुलिस अपना काम कर रही है।
सरकार कोर्ट के आदेश की प्रति प्राप्त होने के बाद इसे देखेगी। इसका अध्ययन करने के बाद जो कानून सम्मत होगा, उसके हिसाब से कोर्ट में जवाब दाखिल करेंगे। हमारी सरकार कानून का पालन करने वाली सरकार है।
- पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री
जैसे हमारे संज्ञान में आया, तो हमने मुकदमा दर्ज के आदेश दिए और मुकदमा दर्ज हो गया। इसके बाद निष्पक्ष जांच के लिए एसआईटी गठित की गई। जो भी तथ्य सामने आएंगे, उसके अनुसार कार्रवाई की जाएगी। इस प्रकरण में किसी को बख्शा नहीं जाएगा। पुलिस किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं है।
- अशोक कुमार, पुलिस महानिदेशक
सुप्रीम कोर्ट का दखल, राज्य सरकार केे मुंह पर तमाचा : हरीश रावत
हरिद्वार धर्म संसद में आपत्तिजनक भाषण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और उत्तराखंड सरकार को नोटिस जारी किया है। इस मामले में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इसे राज्य सरकार के मुंह पर करारा तमाचा बताया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल देने के बाद स्पष्ट हो गया है कि राज्य सरकार इस पूरे मामले में नाकाम साबित हुई है। बुधवार को इस मामले में पूर्व सीएम हरीश रावत ने कहा कि किसी भी स्टेट में कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय होता है। एफईआर या शिकायत दर्ज कराना एक नागरिक का अधिकार है लेकिन जब उस पर सुनवाई न हो, तो ऐसे मामलों में कोर्ट दखल देती हैं। इस मामले में भी यदि सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ा है तो इसका मतलब है कि इसमें कुछ विशेष निकलकर सामने आया है। तभी कोर्ट ने इसे दखल के लायक समझा है। यह सीधे-सीधे राज्य सरकार के मुंह पर एक तमाचा है। इस पूरे मामले में राज्य सरकार बेनकाब हो गई है। उन्होंने कानून के मुताबिक काम नहीं किया।
धर्म संसद से नफरती मानसिकता वाले परेशान : स्वरूप
धर्म संसद के संयोजक एवं शांभवी पीठाधीश्वर स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि धर्म संसद की बढ़ती लोक प्रसिद्धि से देश में जिहादी मानसिकता वाले लोग परेशान हैं। वे धर्म संसद रोकने का हरसंभव प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए कुचक्र रच रहे हैं। हिंदू विरोधी मानसिकता वाले लोग हिंदू समाज को बदनाम करने का प्रयास कर रहे हैं। स्वामी आनंद स्वरूप ने कहा कि आगामी धर्म संसदों का आयोजन अलीगढ़, कुरुक्षेत्र और हिमाचल प्रदेश में होना है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं वकील कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में धर्म संसदों पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की थी। आनंद स्वरूप ने दावा किया कि कोर्ट ने रोक लगाने से मना कर दिया है। उन्होंने कहा कि कपिल सिब्बल हिंदू विरोधी ताकतों के साथ खड़े रहते हैं। भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठा चुके हैं। सिब्बल के पीछे कौन लोग हैं, इसकी भी जांच होनी चाहिए।
धर्म संसद मामले की निष्पक्ष जांच हो : आप
आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता नवीन पिरशाली ने कहा कि हरिद्वार में धर्म संसद मामले की उच्च स्तर पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सरकार की कार्यप्रणाली उजागर हुई है। आप का कहना है कि भाजपा जिस एजेंडे पर राजनीति करती है। उससे सभी भलीभांति परिचित है। हरिद्वार में धर्म संसद पर जिस तरह आपत्तिजनक बयान दिए गए है। उस पर सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं है। जबकि इससे मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए। अब सुप्रीम कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप कर सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। जो सरकार की कार्यप्रणाली को दर्शाती है।