2002 के पीसीएस अधिकारियों को बहुत लम्बी और कठिन लड़ाई के बाद सुप्रीम न्याय मिला है। यदि शुरु में ही इनकी वरिष्ठता निर्धारित हो जाती तो वर्ष 2011-12 में इन्हें आईएएस कैडर मिल जाता और इनमें अधिकांश जिलों में डीएम रह चुके होते जो किसी भी आईएएस के लिए ख्वाब और प्रतिष्ठा भी होती है। खास बात यह है कि इन्हीं के बैच के पुलिस के पीपीएस लंबे आईपीएस में पदोन्नति पाकर जिलों में कप्तानी कर चुके हैं और कर रहे हैं।
नैनीताल के वर्तमान एसएसपी पंकज भट्ट भी इन्हीं में से हैं। लेकिन इसी बैच के पीसीएस अफसरों को आईएएस में पदोन्नति नहीं मिल पाई। अब कोर्ट ने फरवरी 2020 के अपने आदेश के अनुरूप 2002 बैच के अधिकारियों को वरिष्ठता देते हुए तदनुसार सूची तैयार कर चार सप्ताह में कोर्ट को अवगत कराने के कड़े निर्देश दिये हैं। 2002 की परीक्षा के परिणाम और ट्रेनिंग के बाद जुलाई 2005 में इन अधिकारियों ने सेवा ज्वाइन की।
इस बीच वर्ष 2007 में पूर्व में उत्तर प्रदेश से आये अधिकारी पीसीएस में प्रोन्नत कर एसडीएम बनाये गये। वर्ष 2010 में सरकार ने पीसीएस अधिकारियों की वरिष्ठता सूची जारी की जिसमें प्रोन्नत अधिकारियों को सीधी भर्ती वाले अधिकारियों से कनिष्ठ माना गया। पदोन्नत अधिकारियों ने हाईकोर्ट में वाद दायर कर इसका विरोध किया जिस पर हाईकोर्ट ने पदोन्नत अधिकारियों के पक्ष में निर्णय देते हुए उन्हें वरिष्ठ माना।
2002 बैच के पीसीएस अधिकारियों ने हाईकोर्ट के निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 14 फरवरी 2020 को निर्णय देकर सीधी भर्ती वाले अधिकारियों को वरिष्ठ मानने का आदेश जारी कर कहा कि तदर्थ सेवा को वरिष्ठता में शामिल नहीं किया जा सकता। यह आदेश प्रदेश सरकार ने अब तक लागू नहीं किया था जिस पर विनोद गिरी गोस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की जिस पर कोर्ट ने मंगलवार को यह आदेश जारी किया।