छह महीनों से दक्षिण के शीतल पितृलोक की ओर चल रही भगवान भास्कर की महायात्रा अब विराम के साथ उत्तर के देवलोक की ओर चल पड़ेगी। धनु राशि का त्यागकर सूर्य जैसे ही मकर राशि में प्रविष्ट होंगे, दक्षिणायन संपन्न होगा, उत्तरायण प्रारंभ हो जाएगा। अग्नि, गुड़, तिल, खिचड़ी, घी आदि से जुड़े पर्वों की शुरुआत होगी। पौष के खरमास में रुके विवाह भी प्रारंभ हो जाएंगे। उत्सव प्रिया उत्तरायणी के आगमन से विवाह, मुंडन, यग्योपवीत, कर्णछेदन आदि मांगलिक संस्कार शुरू होते ही सूर्य का तापमान तिलतिल बढ़ने लगेगा।
गरुड़ पुराण, विष्णु पुराण और मत्स्य पुराण आदि के अनुसार उत्तर में देवलोक और दक्षिण में पितृलोक स्थित हैं। मार्त्तंड पंचांग के आचार्य प्रियव्रत शर्मा के अनुसार विज्ञान ने इन्हें उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव बताया है। सूर्यनारायण जब दक्षिण की ओर बढ़ते हैं तब दक्षिणी ध्रुव और पितृलोक के अत्यंत ठंडे होने के कारण सर्दी बढ़ जाती है। दक्षिणी लोक में रातें बड़ी और दिन छोटे होते हैं। सूर्य की दक्षिण यात्रा को दक्षिणायन कहा जाता है और यह सूर्य के कर्क राशि में जाने पर आषाढ़ मास में प्रारंभ होती है। जैसे जैसे सूर्य दक्षिण की ओर बढ़ेगा रात बड़ी होने से उसका तापमान घटता जाएगा।
शास्त्र बताते हैं कि छह महीनों की दक्षिण यात्रा के बाद सूर्य का प्रवेश मकर राशि में होता है। ऐसा होने पर सूर्य उत्तर के देवलोक यानी उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ते हैं। देवलोक यानि इस उत्तरी गोलार्ध पर दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। परिणामस्वरूप सूर्य का तापमान मकर संक्रांति से बढ़ने लगता है। ऐसा होते ही प्रकृति खिल उठती है, उमंगें आती हैं, धरती पर उत्सव प्रारंभ हो जाते हैं।
पंडित दिनेशचंद्र मौद्गल्य बताते हैं कि मकर संक्रांति की महत्ता पुराणों के साथ-साथ छांदोग्य उपनिषद में भी गाई गयी है। शास्त्रों में सूर्य के उत्तरायण होने का महापुण्य बताया गया है। महाभारत का युद्ध जिन दिनों हुआ, तब दक्षिणायण चल रहा था। इसीलिए शरशैया पर पड़े भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की। जैसे ही सूर्य मकरस्थ हुए, भीष्म ने प्राण त्याग दिए। इस बार मकर में सूर्य का संक्रमण चूंकि सवेरे हो जाएगा अत: पुण्यकाल शुक्रवार को पूरे दिन बना रहेगा। संवाद