विजय पाल ने दिव्यांगता से लड़ते हुए सीजन के हिसाब से हरकी पैड़ी और हरिद्वार की सड़कों पर घूम-घूम सामान बेचना शुरू किया। यह सिलसिला बीते आठ सालों से जारी है। विजय पाल एक पैर घसीटकर चलता है।
कई श्रद्धालु दया पात्र समझकर उसे भीख देने की कोशिश भी करते हैं। वह भीख नहीं लेता। दया दिखाने वालों से सामान खरीदने का आग्रह करता है। कोरोना कर्फ्यू में जब बड़े से बड़े व्यापारी घर बैठ गए थे, विजय पाल ने मास्क और सैनिटाइजर की छोटी शीशियां बेचकर पैसे जुटाए।
15 दिन में जाता है घर
विजय पाल के परिवार में मां-पिता और पांच बहनों के अलावा पत्नी और छोटा बेटा है। पूरे परिवार की जिम्मेदारी विजय पाल के कंधों पर है। परिवार कांठ में रहता है। वह 15 दिन में एक बार घर जाता है।