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कोर्ट के स्टे ने बचाई आसाराम की लाज

Thu, 19 Sep 2013 09:26 PM IST
अमर उजाला, नई टिहरी
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ऋषिकेश में मुनिकीरेती नीरगढ़ में वन भूमि पर बने आसाराम के आश्रम को हटाने की वन विभाग की तैयारी धरी की धरी रह गई। आश्रम संचालक को इस मामले में हाईकोर्ट से स्टे मिल चुका है।
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अतिक्रमण हटाने को लेकर वन विभाग की ढुलमुल कार्यप्रणाली पर लोग सवाल उठा रहे हैं। वन भूमि पर मुनिकीरेती नीरगढ़ में बने आसाराम के आश्रम को हटाने के लिए वन विभाग ने 9 सितंबर को अंतिम नोटिस जारी किया था।

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भूमि खाली करने का समय
आश्रम को 16 सितंबर तक वन भूमि खाली करने का समय दिया गया था। निर्धारित समयावधि में अतिक्रमण हटाने के अपने आदेश पर वन विभाग अमल नहीं कर पाया।

विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न
आज और कल अतिक्रमण हटाने को लेकर वन विभाग जनता को गुमराह करता रहा। ऐसे में वन विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिह्न लगना स्वाभाविक है।

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बता दें कि 1950 में नीरगढ़ में संत श्री त्यागी लक्ष्मण दास ने वन विभाग से 0.232 हेक्टेयर भूमि लीज पर ली थी। 1969 में लीज समाप्त हो गई थी।

नवीनीकरण के लिए आवेदन
1970 में लक्ष्मण दास ने लीज नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था, लेकिन नवीनीकरण नहीं हो पाया।

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लक्ष्मण दास ने पहले आसाराम को असली चेला बताते हुए वसीयत लिखकर उसे अपना वारिस बताया था, जिसे बाद में खंडित कर रामसेवक दास के नाम किया गया।

सीजेएम कोर्ट में वाद
वर्ष 2001 में लक्ष्मण दास की मृत्यु के बाद आसाराम ने अपने को असली चेला बताते हुए सीजेएम कोर्ट में वाद दायर किया था। वर्ष 2007 में सीजेएम कोर्ट से आसाराम के पक्ष में फैसला आने के बाद रामसेवक हाईकोर्ट में चला गया।
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दोनों के बीच आश्रम के स्वामित्व को लेकर हाईकोर्ट में मामला चल रहा है। वन विभाग से अतिक्रमण हटाने को मिले नोटिस के बाद आश्रम संचालक न्यायालय में चले गए थे। हाईकोर्ट से आसाराम के आश्रम संचालकों को स्टे मिल चुका है।

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इनकी भी सुनिए
मुनिकीरेती नीरगढ़ में वन भूमि से अतिक्रमण हटाने पर हाईकोर्ट से आश्रम को स्टे मिल गया है। इस मामले में वन विभाग विधिक राय लेकर न्यायालय में अपना पक्ष रखेगा। न्यायालय और उच्चाधिकारियों से जो भी दिशा-निर्देश मिलेंगे उसी के अनुरूप कार्रवाई होगी।- वीके भार्गव, डीएफओ मुनिकीरेती
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