सूबे में किसी भी विश्वविद्यालय से संबद्धता का परंपरागत तरीका अब खत्म हो गया है। कॉलेजों को अब किसी विवि से संबद्धता लेने के लिए महीनों, सालों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
राज्यपाल डॉ. केके पाल ने सभी विश्वविद्यालयों को पत्र भेजकर निर्देश दिए हैं कि अब विवि अपने स्तर पर निरीक्षण करने के बाद संस्थान की संबद्धता की फाइल सीधे राजभवन को भेजें। इसकी एक प्रति शासन को भेजी जाएगी, जरूरत पड़ने पर शासन 30 दिन के भीतर राजभवन में अपनी आपत्ति जता सकता है।
प्रदेश में कई कॉलेज ऐसे हैं, जिनका कोर्स पूरा होने के बाद तक भी संबद्धता का निस्तारण नहीं होता है। हाल ही में राजभवन से विशेष कार्याधिकारी अरुण कुमार ढौंडियाल की ओर से भेजे गए पत्र में कहा गया है कि शासन स्तर पर लंबे समय तक प्रकरण लंबित होने की वजह से यह समस्या सामने आती है।
लिहाजा, अब किसी भी नए या पुराने संस्थान की संबद्धता की कार्रवाई का पूरा अधिकार विवि के कुलाधिपति यानी राज्यपाल को होगा। सभी विश्वविद्यालयों को निर्देशित किया गया है कि संस्थान की शासन से संबंधित एनओसी और नियामक संस्था जैसे एआईसीटीई या एनसीटीई आदि से स्वीकृति मिलने के बाद विवि अपने स्तर पर निरीक्षण कराएगा।
यूजीसी के मानकों के हिसाब से कॉलेज अगर सही पाया जाता है तो इसकी फाइल सीधे राजभवन को भेजनी होगी। फाइल की एक कॉपी शासन के ध्यानार्थ भेजी जाएगी। शासन स्तर पर अगर निरीक्षण या कॉलेज को लेकर कोई आपत्ति है तो फाइल पहुंचने के 30 दिन के भीतर अपनी आपत्ति शासन के अधिकारियों को राजभवन सचिवालय में दर्ज करानी होगी। अगर इस समय में आपत्ति न आई तो इसमें राज्य सरकार की सहमति मानते हुए राज्यपाल की ओर से निर्णय ले लिया जाएगा।
यह होगा फायदा
अब कॉलेज को संबद्धता मिलने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। कॉलेज को 31 जनवरी तक विवि में संबद्धता के लिए आवेदन करना होगा। विवि अपने स्तर से निरीक्षण कराने के बाद 20 मार्च तक विवि अधिनियम की व्यवस्था के तहत यह फाइल राजभवन भेज देगा। इसके 30 दिन बाद राजभवन से संबद्धता(स्थाई/अस्थाई) का पत्र जारी कर दिया जाएगा। यह नियम बीएड, बीटेक, एमटेक, बीएससी से लेकर सभी कोर्सेज की संबद्धता पर लागू होगा।
अब तक यह थी व्यवस्था
सबसे पहले कॉलेज अपनी संबद्धता के लिए विश्वविद्यालय में आवेदन करता था। इस आवेदन के आधार पर विवि निरीक्षण कराता था। निरीक्षण के उपरांत फाइल सीधे सचिवालय जाती थी, जहां शासन स्तर पर कॉलेज के मानक, निरीक्षण आदि की जांच की जाती थी। आमतौर पर इस प्रक्रिया में वर्षों का समय लग जाता था। शासन स्तर पर एप्रूव होने के बाद फाइल राजभवन जाती थी, जहां से संबद्धता का पत्र जारी होता था।