ग्रामीण बताते हैं कि प्राचीन समय में इस स्थान पर चिंता सिंह का राज हुआ करता था। इस स्थान को चिंता कोट कहा जाता था जबकि गौड़ी के दूसरी तरफ चंद राजा का शासन था, जिसका बसान गांव में मंदिर भी बना हुआ है। ग्रामीणों के मुताबिक हो सकता है कि इन सुरंगों का संबंध प्राचीन राजाओं से हो।
सुरंगों का बारीक वैज्ञानिक विश्लेषण जरूरी : डॉ. प्रशांत
चंपावत राजकीय महाविद्यालय के इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रशांत जोशी इन सुरंगों को दो तरीके से देखते हैं। उनका मानना है कि पहली नजर में इनका संबंध महाभारत काल या चंद राजाओं से प्रतीत होता है।
डॉ. जोशी का कहना है कि गौड़ी क्षेत्र से कुछ किमी दूर घटोत्कच, हिडिंबा, मानेश्वर जैसे प्राचीन महत्व के देव स्थल हैं। अज्ञातवास के दौरान पांडव इस क्षेत्र में रहे थे। हो सकता है उन्होंने इस दौरान इन सुरंगों का उपयोग छिपने के लिए किया हो। इसके अलावा काली कुमाऊं में 1365 से 1420 तक चंद राजवंश के ज्ञानी चंद का उल्लेख इस क्षेत्र में मिलता है।
हो सकता है उस समय नेपाल के राजाओं से मुकाबला करने के लिए इन गुप्त रास्तों का उपयोग किया जाता हो। इन रास्तों से हथियार और अन्य जरूरी सामग्री ले जाई जाती हो। अलबत्ता, उनका कहना है कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इन सुरंगों के बारीक वैज्ञानिक विश्लेषण की जरूरत है।
जिम कार्बेट के गौड़ी में नरभक्षी बाघ को मारने से यह क्षेत्र महत्वपूर्ण है। अमर उजाला से सुरंगों की जानकारी मिलने के बाद विशेषज्ञों के साथ प्रशासन की टीम को इसके निरीक्षण के लिए भेजा जाएगा। अगर ये सुरंगें ऐतिहासिक महत्व की होंगी, तो पुरातत्व और पर्यटन विभाग से मंत्रणा कर इन्हें विकसित किया जाएगा।
- सुरेंद्र नारायण पांडेय, जिलाधिकारी चंपावत।