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कई समस्याओं से जूझ रहा है खेती के लिए प्रसिद्ध मझगांव

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बनबसा के मझगांव में लहलहाती खेती।संवाद - फोटो : TANAKPUR
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बनबसा (चंपावत)। क्षेत्र का दूरस्थ मझगांव आजादी के करीब 7.5 दशक बाद भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है। नेपाल की अंतरराष्ट्रीय और ऊधमसिंह नगर जिले की सीमा से सटे इस गांव के निवासी इस सदी में भी आदिवासियों सा जीवन जीने के लिए विवश हैं जबकि देवीपुरा ग्राम पंचायत के इस तोक में रहने वाले 300 परिवारों में करीब 900 मतदाता पंजीकृत हैं।
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क्षेत्र का खेती संपन्न मझगांव मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहा है। भूमि का मालिकाना हक न होने से लोग कई सरकारी योजनाओं समेत बैंक ऋण से भी वंचित हैं। बुजुर्ग ग्रामीणों के मुताबिक वर्ष 1930-32 के आसपास यह गांव थारू जनजाति के लोगों का था, जिसे वे मझगई के नाम से पुकारते थे, जो बाद में मझगांव बन गया।
वर्ष 1940 के आसपास लोहाघाट, चंपावत क्षेत्रों से लोग जाड़ों में अपने मवेशी लेकर यहां घाम तापने (धूप सेंकने) आते थे। ग्रीष्मकाल में वे पहाड़ों की ओर लौट जाते थे। वर्ष 1960 के आसपास ग्रामीणों ने यहां स्थायी तौर पर बसना शुरू किया। प्रधान दीपक प्रकाश चंद ने बताया कि भूमि का मालिकाना हक न होने से मझगांव के ग्रामीण आवास, शौचालय, संपर्क मार्ग, सिंचाई गूल आदि से वंचित हैं।
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जंगली जानवरों के आतंक से त्रस्त हैं ग्रामीण
बनबसा (चंपावत)। नेपाल सीमा से सटे मझगांव को जंगली जानवरों के आतंक से जूझना पड़ता है। फसलों के नुकसान के साथ ही जंगली जानवर मवेशियों को मारते रहते हैं। भूस्वामित्व के अभाव में ग्रामीण उत्पादित अनाज सरकारी क्रय केंद्रों में नहीं बेच पाते हैं। उन्हें अपना अनाज बिचौलियों को सस्ते में देना पड़ता है। बैंक ऋण न मिलने से ग्रामीण कारोबार एवं शिक्षा ऋण से वंचित हैं। खेती के लिहाज से क्षेत्र का सबसे बड़ा गांव होते हुए भी कृषि और उद्यान विभाग ने यहां जागरूकता और प्रशिक्षण शिविर नहीं लगाया है।
काबिज वन भूमि पर मालिकाना हक न होने से ग्रामीण परेशान
बनबसा (चंपावत)। मझगांव वासी 85 वर्षीय रामी चंद बताते हैं कि गांव में संपर्क मार्गों की जरूरत है। करीब 80 वर्षीय शांति देवी का कहना है कि गांव में कई परिवार शौचालयों से वंचित हैं। पूर्व उपप्रधान कमला उप्रेती गांव में आवासीय अनुदान न मिल पाने की समस्या बताती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता दीपक पठक के मुताबिक काबिज वन भूमि पर मालिकाना हक न होने से ग्रामीण सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे हैं।
नियमानुसार वन या सरकारी भूमि पर मालिकाना हक न होने से लोगों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। सरकारी जमीनों पर ऐसी भूमि पर रहने को अतिक्रमण माना जाता है। इसके लिए ग्रामीणों को पहने भूमि का मालिकाना हक लेना होगा।
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- हिमांशु कफल्टिया, एसडीएम टनकपुर।
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