पूर्णागिरि धाम (चंपावत)। पलायन की मार से खाली होते गांवों में सांस्कृतिक विरासत को बचाना भी चुनौती हो गया है। इसका असर रंगों के पर्व होली पर भी पड़ा है। जिले की कालीगूंठ ग्राम पंचायत के खर्रागूंठ गांव में बीते 23 साल से होली और दूसरे त्योहार नहीं हो रहे हैं। यहां अधिकतर घरों में ताले लटकने से होली नहीं हो पा रही है।
खर्राटाक गांव खड़ी होली के लिए जाना जाता था लेकिन 1996 के बाद इस गांव में एक भी परिवार नहीं रहता। यहां के सभी 27 परिवार दूसरी जगह बस गए हैं। मंदिर समिति के अध्यक्ष पंडित किशन तिवारी, सुरेश तिवारी, दुर्गादत्त तिवारी, प्रकाश तिवारी, गिरीश तिवारी आदि का कहना है कि गांव के सभी 27 परिवारों के सेलागाड़, पूर्णागिरि, नायकगोठ या त्यारकूड़ा चले जाने से गांव वीरान हो गया है। गांव तक पहुंचने के लिए सड़क भी नहीं है। शुरू के तीन साल कुछ लोग होली और दूसरे पर्व मनाने की रस्म गांव जा कर पूरी करते थे, लेकिन 1999 से ये क्रम पूरी तरह टूट गया। ग्रामीण बताते हैं कि सालभर में एक बार होने वाली सामूहिक पूजा में ही गांव के लोग मिलते हैं।
खर्राटाक के युवाओं ने गांव की होली नहीं देखी है। अब गांव में कोई रहता नहीं। बस गांव भी तभी जाना होता है, जब सामूहिक पूजा होती है। - राजेंद्र तिवारी।
खर्राटाक गांव आबादीविहीन हो गया है। सड़क और अन्य सुविधाओं की कमी से गांव में लोग ही नहीं है। ऐसे में इस गांव के लिए क्या होली और क्या दूसरे त्योहार? - प्रकाश तिवारी, सरपंच।
... और इधर 25 साल बाद शुरू हुई होली
पाटी/चंपावत। खर्राटाक गांव के उल्ट पाटी ब्लॉक के एक गांव से अच्छी खबर है। यहां बैरख गांव में ढाई दशक तक होली नहीं मनाई गई। 1997 के बाद से पहली बार गांव में होली मनाई जा रही है। अबीर-गुलाल के साथ ही खड़ी होली गीतों का गायन किया जा रहा है। युवाओं और बुजुर्गों की सात माह की कवायद के बाद फिर से होली शुरू हो सकी है।
बैरख गांव के निवासी और देवीधुरा डिग्री कॉलेज के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष प्रकाश माहरा बताते हैं कि उनके गांव में 1997 के बाद पहली बार होली के रंग बिखरे हैं। होली बंद होने की वजह शराबखोरी और लड़ाई-झगड़ा था। मारपीट के चलते होली के दौरान गांव में अक्सर माहौल खराब हो जाता था तो धीरे-धीरे लोगों ने होली से ही दूरी बनानी शुरू कर दी और 1997 में होली बंद हो गई। बस रस्म को निभाने के लिए गांव के लोग परिवार में ही अबीर-गुलाल लगा लेते थे। कुछ लोग पड़ोस के गांव पखौटी और भैसर्ख में जाकर होली मनाते थे।
लंबे अंतराल से होली न मनाने पर पिछले साल कोरोना के दौरान लोगों ने इसे शुरू करने के लिए चर्चा की। युवाओं की ये बात बड़े-बुजुर्गों तक पहुंची तो उन्होंने अनुशासन, नियम और संयम की शर्त पर होली शुरू करने की इजाजत दे दी। होली के प्रति ललक के चलते बड़ी संख्या में लोगों ने शराब भी छोड़ दी और फिर एक माह पहले महेंद्र मेहरा, दीपक मेहरा, नैन सिंह, हर सिंह, गिरीश नेगी, दिलीप मेहता, योगेश मेहरा, इंद्र सिंह, कुंदन मेहता, कमला, शांति, लक्ष्मी, मुन्नी, हीरा देवी सहित तमाम ग्रामीणों ने औपचारिक रूप से होली मनाने का निर्णय लिया।