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ये भी कोई जिंदगी है, जानवरों जैसा जीवन है हमारा!...

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कठौती गांव में टोकरी में रखे एक साल के शिशु दीपक के साथ मां नीमा। संवाद न्यूज एजेंसी - फोटो : TANAKPUR
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चंद्रशेखर जोशी
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ककनई (चंपावत)। न कोई हैसियत न कोई सुनवाई। जब सुनवाई ही नहीं होती तो समस्याओं का समाधान का सवाल पैदा नहीं होता। डांडा-ककनई गांव के लोगों की यह पीड़ा है। ये वे दो गांव हैं जहां के 10 लोगों ने तीन दिन पहले बरात की जीप दुर्घटनाग्रस्त होने पर जान गंवाई है। ग्रामीण विकास की किरण नहीं पहुंचने से परेशान हैं। कहते हैं कोई नहीं सुनता। अब अपने में जी रहे हैं।
इस क्षेत्र में सुविधाओं का अकाल है। बीमार को इलाज के लिए 76 किमी दूर टनकपुर ले जाने की मजबूरी है। खेतों में सिंचाई की सुविधा नहीं होने से खेती पर पानी फिर रहा है, तो बचीखुची फसल को जंगली जानवर साफ कर रहे हैं। इस पर भी जो बच गई, उसे सड़क तक पहुंचाने में लगने वाले भाड़े में ही सब बराबर हो जाता है। 200 रुपये बोरा भाड़ा लगता है। यही हाल यहां पहुंचने वाले सामान का भी है। 10 रुपये का नमक यहां पहुंचते-पहुंचते 14 रुपये का हो जाता है। आधारभूत सुविधाओं के अभावों के संसार में दिन काटने वाली बीना कहती हैं कि हम सचमुच जानवर की जिंदगी जी रहे हैं।
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एक खंभे में मोबाइल फोन रख ग्रामीण तलाशते हैं सिग्नल
ककनई (चंपावत)। जीप हादसे में मोहन सिंह महरा के एक निकट रिश्तेदार की मौत हुई। बाहर रहने वाले संबंधियों को इसकी जानकारी देने के लिए वह परेशान रहे। सिग्नल आने के संभावित जगह पर एक फीट ऊंचा खंभा बनाया है। सात मिनट तक उन्होंने बीएसएनएल के सिग्नलों का इंतजार किया, सिग्नल आए भी लेकिन बात नहीं हो सकी। फिर अपने संबंधियों तक सूचना देने के लिए एक शख्स को आठ किमी दूर डांडा में सिग्नल वाली जगह भेजा।
ककनई में खेत में उतरता है हेलीकॉप्टर
ककनई (चंपावत)। चंपावत जिले में अभी एक भी हेलिपैड नहीं है। डांडा-ककनईं में तो हेलिकॉप्टर उतारने के लिए अस्थायी व्यवस्था के लिए सरकारी जमीन भी नहीं है। ग्रामीण भुवन पंत बताते हैं कि उत्तराखंड बनने के बाद ककनई में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के अलावा राज्यसभा सांसद के रूप में भगत सिंह कोश्यारी 13 दिसंबर 2011 को यहां हेलिकॉप्टर से आए थे।
छह महीने से बंद है सड़क कटिंग का काम
ककनई (चंपावत)। टकनागूंठ से डांडा मल्ला की 16 किमी सड़क की कटिंग अब तक पूरी हो चुकी होती लेकिन सितंबर 2021 से काम में लगी रोक से अभी चार किमी काम नहीं हो सका है। इसके चलते बच्चे, बीमार और बुजुर्गों को लंबी पैदल दूरी तय करनी पड़ रही है।
प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 8.58 करोड़ रुपये से निर्माणाधीन इस सड़क की कटिंग का काम 2020 से शुरू हुआ था लेकिन 95 मीटर के हिस्से में बगैर अनुमोदन के सड़क का समरेखन बदलने और स्वीकृत पेड़ों के बजाय दूसरी जगह पेड़ काटने के चलते वन विभाग ने काम पर रोक लगाई है। काटे गए इन 37 पेड़ों की अनुमति नहीं ली गई थी।
ईई एपी जोशी का कहना है कि 95 मीटर हिस्से का समरेखन बदलने को अनुमोदन मिल चुका है। वन अनापत्ति दूर करने के लिए पत्रावली दिल्ली में लंबित है। वहीं पूर्व बीडीसी सदस्य जगदीश परगाई ने सड़क की बदहाली का मामला उठाते हुए डांडा पहुंचे सीएम से एसडीएम सड़क के डामरीकरण कार्य को तुंरत शुरू कराने की मांग की।
हमारे लिए यही दुनिया है। सड़क नहीं होने से अक्सर यहां से जाना नहीं होता, तो यह पता ही नहीं चलता कि बाहर की दुनिया कैसी है।
-बीना, कठौटी।
गांव के लोग जिंदगी को ढो रहे हैं। पानी भरने के लिए गधेरे जाने की मजबूरी है। सड़क तक पहुंचने के लिए नौ किमी का पैदल जाते हैं।
सीता देवी, कठौटी।
बच्चों का कोई भविष्य नहीं है। उनका काफी वक्त पानी ढोने में बर्बाद होता है। और जो बच जाता है, स्कूल जाने में निकल जाता है। -सावित्री देवी, कठौटी।
यह क्षेत्र कालापानी सरीखा है। सुविधाओं का पूरी तरह टोटा है, लेकिन दो सबसे बड़ी जरूरतें मोबाइल नेटवर्क और सड़क है।
चंद्रशेखर गड़कोटी, साल।
डीएम का पक्ष
डांडा-ककनई सहित आसपास के इन तमाम पिछड़े क्षेत्रों की आधारभूत सुविधाओं के लिए चुनाव आचार संहिता हटने के बाद कार्ययोजना बनाकर तेजी से काम कराया जाएगा। एसडीएम सड़क के डामरीकरण को शुरू कराने के लिए पीएमजीएसवाई से कहा जा रहा है। संचार सहित अन्य जरूरी सुविधाओं को प्राथमिकता से सुधारा जाएगा।
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-विनीत तोमर, डीएम, चंपावत।
सांसद की बात
डांडा-ककनई सहित यहां के तमाम गांवों में संचार और सड़क दोनों की स्थिति बेहद खराब है। इसकी वजह से समय पर हादसे की जानकारी नहीं मिल सकी और वक्त पर मदद नहीं दिलाई जा सकी। संचार सुविधा के लिए दूरसंचार मंत्रालय के सामने मामले को उठाएंगे।
-प्रदीप टम्टा, सांसद।
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