लोहाघाट (चंपावत)। आजादी के 75 साल के उपलक्ष्य पर मनाए जा रहे अमृत महोत्सव में सेनानियों से संबंधित कई कार्यक्रम हो रहे हैं, लेकिन इस जिले के सबसे प्रमुख आजादी के योद्धा की बेकद्री हो रही है। कुमाऊं में आजादी के जंग की ज्वाला को धधकाने वाले वीर कालू सिंह माहरा को प्रदेश सरकार स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानने के लिए भी तैयार नहीं। उत्तराखंड शासन ने सात अप्रैल 2015 को केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजे पत्र में यही बात लिखी है।
वर्ष 1857 में मेरठ से शुरू हुई पहली स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी यहां भी भड़की थी। इस गदर में यहां के कई सेनानियों ने हिस्सा लिया। बिशुंग क्षेत्र के कालू जिले के पहले स्वतंत्रता सेनानी थे। तिब्बत के साथ व्यापार करने वाले ठाकुर रतिभान सिंह के बेटे कालू ने रोहेला नवाब खान से प्रेरित होकर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ी थी लेकिन फिर भी वह सेनानी नहीं हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजे पत्र में प्रदेश शासन अप्रैल 2015 में ही कह चुका है कि कालू को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित करना संभव नहीं है। इसके लिए वह सेनानी से संबंधित कोई भी साक्ष्य न मिलने को आधार बनाती है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नियमावली में सेनानी घोषित करने के लिए साक्ष्य जरूरी है।
कालू का आजादी में योगदान
कुमाऊं का स्वाधीनता संग्राम में योगदान पत्रिका के मुताबिक काली कुमाऊं में गदर में शिरकत के लिए कालू माहरा के नेतृत्व में चौड़ापिता के बोरा, रैघों के बैड़वाल, रौलमेल के लडवाल, चकोट के क्वाल, धौनी, मौनी, करायत, देव, बोरा, फर्त्याल एकत्र हुए थे।
इन लड़ाकों ने लोहाघाट की बैरक में आग लगाकर अंग्रेजों को भगाया था। कमिश्नर रैमजे ने टनकपुर और लोहाघाट से सैन्य टुकड़ी भेज इन आंदोलनकारियों को रोका। बस्टिया में कालू माहरा ने अंग्रेजों का जमकर मुकाबला किया, लेकिन उन्हें पीछे हटना पड़ा। कूर्मांचल केसरी बद्री दत्त पांडेय का कहना है कि कालू को कई जेलों में रखा गया। इसी दौरान दो अन्य क्रांतिकारियों आनंद सिंह फर्त्याल और बिशन सिंह करायत को अंग्रेजों ने गोली मार दी थी।
... लेकिन माहरा के नाम पर होते रहे हैं कई कार्यक्रम
भले ही कालू माहरा को सेनानी नहीं माना गया है, लेकिन लोग उन्हें आजादी का महानायक मानते हैं और उनसे संबंधित कार्यक्रम चंपावत जिले में होते रहे हैं। वर्ष 1997 में खेतीखान में कार्यक्रम हुआ। वर्ष 2004 में इतिहासकार डॉ. शेखर पाठक सहित कई दिग्गजों की मौजूदगी में व्याख्यानमाला हुई। वर्ष 2007 में उनके पैतृक आवास से पावन माटी कार्यक्रम हुआ। वर्ष 2010 में तत्कालीन डीएम की मौजूदगी में उनके नाम पर लोहाघाट चौराहे का नाम रखा गया।
मकान में आग लगने से खाक हुए थे प्रमाण
सेनानी कालू के पौत्र विजय सिंह माहरा का कहना है कि अगर वे सेनानी नहीं थे तो उनके नाम पर कार्यक्रम क्यों कराए जाते रहे। उनका कहना है कि आजादी में जंग लड़ने के बावजूद अब सबूत मांगना बेतुका है जबकि अंग्रेजों ने सेनानी के थुवामहर गांव के मकान में आग लगाकर सारे प्रमाण और अन्य सामान जला दिया था।
चंपावत जिले में 32 स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंजीकृत हैं लेकिन इनमें कालू सिंह माहरा शामिल नहीं हैं। सेनानी से संबंधित साक्ष्य न मिलने से उन्हें सेनानी का दर्जा नहीं दिया जा सका है। - केएन गोस्वामी, एसडीएम, लोहाघाट।