नौरख के कैलापीर मंदिर में आयोजित तीन दिवसीय नंदा अष्टमी मेला धार्मिक और उल्लास के साथ संपन्न हो गया। 12 वर्ष बाद आयोजित इस नंदाष्टमी मेले में सैकड़ों श्रद्धालु देवताओं के मिलन के साक्षी बने। भक्तों को प्रसाद के रूप में ब्रह्मकमल दिए गए।
11 सितंबर को देवता के पश्वा उच्च हिमालय क्षेत्र कुंआरी पास और गोरसों बुग्याल में ब्रह्म कमल लेने पहुंचे थे और मंगलवार को वह सुबह करीब दस बजे 60 किलोमीटर की पैदल दूरी तय करने के बाद फुलारी (ब्रह्मकमल लाने वाले) कैलापीर मंदिर पहुंचे। यहां भक्तों ने फुलारियों का फूल-मालाओं से स्वागत किया। इस दौरान बंड भूमियाल, कैलावीर और बजीर देवता का अद्भुत मिलन हुआ जिसे देख हर कोई भावुक हो गया। श्रद्धालुओं ने अपने आराध्य देवताओं के दर्शन कर मनौतियां मांगीं। तीन दिनों तक मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किया गया। महिलाओं और ध्याणियों ने मां नंदा के पारंपरिक जागर गाकर मां नंदा का आह्वान किया। मेला संपन्न होने पर श्रद्धालुओं को प्रसाद के रूप में ब्रह्मकमल दिया गया। व्यापार संघ पीपलकोटी की ओर से मंदिर में भंडारे का आयोजन किया गया। बदरीनाथ क्षेत्र के विधायक महेंद्र भट्ट भी मंदिर में मत्था टेकने पहुंचे। इस मौके पर नंदन सिंह परमार, बंड मंदिर समिति के अध्यक्ष पूरण सिंह चौहान, पूर्व अध्यक्ष अतुल शाह, रविंद्र सिंह, वीर हंसराज, दिलवर सिंह, संजय भंडारी, बृहषराज तड़ियाल, महेंद्र सिंह, बहादुर सिंह, महावीर राणा, विक्रम कनेरी, जसवंत राणा, बंड विकास संगठन के अध्यक्ष शंभू प्रसाद सती, आशीष खाती, देवेंद्र सिंह नेगी आदि मौजूद थे। वहीं, निजमुला घाटी के गाड़ी गांव में भी नंदा अष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया।
बामणी गांव में पहुंची भगवान कुबेर की डोली
जोशीमठ। बदरीनाथ धाम के समीप बामणी गांव में नंदा अष्टमी का पर्व धूमधाम से मनाया गया। गांव में आयोजित तीन दिवसीय मेले में महिलाओं ने मां नंदा के जागर गाए। इस दौरान बदरीनाथ धाम से कुबेर भगवान की उत्सव डोली भी बामणी गांव पहुंची। श्रद्धालुओं ने मां नंदा के साथ ही कुबेर भगवान की पूजा-अर्चना की। 12 सितंबर को बामणी गांव से दो फुलारी (ब्रह्म कमल लाने वाले) मां नंदा को मायके में बुलाने के लिए नीलकंठ पर्वत की तलहटी में गए थे। 13 सितंबर को नंदा सप्तमी पर फुलारी मां नंदा के प्रतीक के रूप में ब्रह्म कमल लेकर बामणी गांव पहुंचे। मान्यता है कि ब्रह्म कमल के रूप में मां नंदा बामणी गांव पहुंचती हैं। 16 सितंबर को पारंपरिक रीति रिवाज के साथ मां नंदा को कैलाश के लिए विदा किया जाएगा। संवाद