सीमेंट, कंक्रीट के इस्तेमाल से बचना जरूरी
छायाकार साह और बिष्ट बताते हैं कि ट्रैकिंग रूट पर हो रहे निर्माण कार्य में सीमेंट और कंक्रीट का उपयोग, भारी-भरकम साइन बोर्ड लगाने से ग्लेशियर की सेहत पर असर पड़ रहा है। यहां स्थानीय संसाधन बांस, रिंगाल आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। ट्रैकरों और सैलानियों को नियंत्रित करने, टूर गाइड को विधिवत प्रशिक्षण दिलाने, साइन बोर्ड में वास्तविक दूरी और ट्रैक रूट के अनुसार आवाजाही का टाइमिंग भी अंकित किया जाना चाहिए।
11 बार पिंडारी जा चुके हैं साह
अनूप साह अब तक 11 बार पिंडारी जा चुके हैं। इससे पूर्व 1998 में वह पिंडारी ग्लेशियर गए थे। वह 1994 में ट्रेल पास, 1972 में नंदा खाट, 1972 और 2023 में बल्जूरी का सफल अभियान भी कर चुके हैं। उनके साथ गए धीरेंद्र बिष्ट ने इससे पूर्व 38 साल पहले पिंडारी गए थे। छायाकार बिष्ट ने बताया कि विगत 16 अक्तूबर को वह रानीखेत से रवाना होकर खाती पहुंचे थे जहां से द्वाली, फुर्किया होते हुए 20 को जीरो प्वाइंट जाकर वापस लौटे और 22 अक्तूबर को बागेश्वर पहुंचे।