अल्मोड़ा। पुस्तकों को सबसे बेहतरीन मित्र माना जाता है। अकेलापन दूर करना हो या खाली समय बीताना हो, कोई भी किताब उठा लीजिए, ज्ञानार्जन में बढ़ोतरी तय है। किताबों की दुनिया में रचने बसने वालों का व्यक्तित्व ही उसे समाज में अलग पहचान देता है लेकिन किताबों को पढ़ने वालों की संख्या में निरंतर गिरावट आई है। किताबें पढ़ने वाले कम हो गए हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि इंटरनेट की दुनिया ने हाथों में किताबों के बजाय मोबाइल थमा दिया है। बचपन की बाल पत्रिकाएं चंपक, नन्हे सम्राट, लोटपोट, शिशु, वानर, नंदन, बाल हंस आदि अब सिर्फ यादों में रह गई हैं।
बाल पत्रिकाओं के लिए कुछ समय पहले तक लालायित रहने वाले बच्चे आज बाल साहित्य से दूर होते जा रहे हैं। अब उनके हाथों में स्मार्ट मोबाइल, टैबलेट, दिखता है या फिर बच्चे कंप्यूटर पर गेम खेलते नजर आते हैं। पंचतंत्र में पशु-पक्षियों के जरिए नैतिक शिक्षा की कहानी जिसने भी पढ़ी ताउम्र याद रही। बाल साहित्य के रूप में रंग-बिरंगी किताबों में परिश्रम, बलिदान, कर्तव्यनिष्ठा, सच्चाई, साहस जैसे जीवन मूल्यों का समावेश होता था। बाल पत्रिकाओं की डिमांड कम होने से कई नामचीन बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद हो चुका है और कई बंद होने के कगार पर है। कुछ प्रकाशक जैसे तैसे बाल पत्रिका निकाल भी रहे हैं तो वह बिक नहीं रही है।
बड़ों की चिंता
-मछली जल की रानी है बाल कहानी संग्रह के लेखक और बाल साहित्यकार खुशाल सिंह खनी कहते हैं कि स्मार्ट मोबाइल वर्तमान में बच्चों की जरूरत बन गया है, इस वजह से वह बाल साहित्य से दूर हो रहे हैं। मोबाइल पर की गई पढ़ाई हम एक समय बाद भूल जाते हैं लेकिन पुस्तक का पढ़ा ताउम्र याद रहता है।
-जीआईसी द्वारसों के भूगोल प्रवक्ता ललित भट्ट का कहना है कि माता-पिता भी पाठ्यपुस्तकों के अलावा कोई पुस्तक, बाल साहित्य लाकर नहीं देते। घर में बच्चों की किताबें और पत्रिकाएं होंगी तो रुचि बढ़ेगी। संवाद
पाठकों की कमी से पत्रिका निकालना हुआ मुश्किल
अल्मोड़ा। बच्चों की पत्रिका बाल प्रहरी के संपादक उदय किरौला कहते हैं कि अभिभावकों में धारणा बन गई है कि यदि वह बाल पत्रिका, कविता, कहानी पढ़ेगा तो उसका ध्यान कोर्स से भटक जाएगा। उसके परीक्षा परिणाम पर असर पड़ेगा। यदि बच्चा कभी कहानी आदि किताब पढ़ता भी है तो अभिभावक उसे इन पुस्तकों को पढ़ने की बजाए कोर्स की किताबें पढ़ने की नसीहत देते हैं। बाल पत्रिकाएं या बाल साहित्य पढ़ने से बच्चों का मनोरंजन होने के साथ ही दिमाग खुलता है। साथ ही उनकी तर्क क्षमता बढ़ती है। पहले दादा-दादी खुद बाल पत्रिका लाकर बच्चों को देते थे। वह खुद भी इन पुस्तकों को पढ़कर बच्चे को सुनाते थे। पढ़ने के संस्कार धीरे-धीरे कम होते जा रहे है। बाल साहित्य पाठकों की घटती संख्या से पत्रिकाएं निकालना मुश्किल हो रहा है। संवाद
कभी पत्रिका खरीदने के लिए जुटती थी भीड़
अल्मोड़ा। नगर के लाला बाजार में 50 साल से पत्र-पत्रिकाओं की दुकान चला रहे उम्मेद सिंह बिष्ट बताते हैं कि कुछ दशक पहले तक चंपक, नन्हे सम्राट, लोटपोट, शिशु, वानर, नंदन, बाल हंस समेत तमाम बाल पत्रिकाएं खरीदने के लिए बच्चों की कतार लगती थीं लेकिन अब इनके बारे में कोई पूछता भी नहीं। पहले बाल पत्रिकाओं की औसतन बिक्री अच्छी होती थी लेकिन अब कोई मांग ही नहीं है। इस कारण अधिकतर नामचीन पत्रिकाओं का प्रकाशन ही बंद हो गया है। संवाद
किताबों की कहानी, बच्चों की जुबानी
मोबाइल चलाना ज्यादा अच्छा लगता है। स्कूल की पढ़ाई ही इतनी ज्यादा है कि बाल पुस्तकें पढ़ने का ज्यादा समय नहीं मिलता है। हां, पंचतंत्र की कहानी जरूर पढ़ी थी।
-कुशाग्र तिवारी, कक्षा पांच, सरस्वती शिशु मंदिर, जीवनधाम
फोटो- 22एएलएम01पी
कहानी की किताब बचपन में पढ़ी थी। अब कोर्स की किताबें ज्यादा है इसलिए समय नहीं मिलता है। छुट्टी के दिन कभी समय मिलता को किताबे पढ़ लेती हूं। ज्यादातर समय कोर्स की किताबें पढ़ती हूं।
-आध्या बिष्ट, कक्षा पांच, सरस्वती शिशु मंदिर जीवनधाम