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उत्तराखंडः जंगल में दिखे 41 स्कूली बच्चों के शव

Sat, 29 Jun 2013 02:13 PM IST
रमेश कुड़ियाल
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पहाड़ के बच्चे स्कूल की छुट्टियों में कहीं यात्रा मार्गों पर काफल बेचते दिखते हैं, तो कहीं होटलों में नौकरी कर अगली कक्षाओं की कापी-किताबों के लिए पैसे जुटाते हैं।
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इस यात्रा सीजन में भी ऐसा ही हुआ। केदारनाथ में होटलों और घोड़े- खच्चर वालों के साथ इस बार भी कई छात्र बतौर मजदूर काम कर रहे थे।

गांवों से आ रही जानकारियों के मुताबिक इनमें कई लापता हैं। कुछ लोगों ने त्रिजुगीनारायण कोटी से गौरी गांव के पीछे के रास्ते जंगल में 41 शव देखे हैं।

काल के ग्रास में समा गए
शव काफी सड़-गल गए हैं। ग्रामीणों ने उनकी मोबाइल से फोटो खींची है। जिससे इन युवाओं की शिनाख्त हो सके।

केदारनाथ घाटी में हुए जलप्रलय से बचाव के लिए कई लोग जंगल की ओर भागे। कुछ बच गए तो कुछ काल के ग्रास में समा गए। ऐसे में उनके शव जंगल में जहां-तहां पड़े होने का अनुमान लगाया जा रहा था।

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अब यह अनुमान सच होता दिख रहा है। गांव वाले भी पहले अपनों के लौटने का इंतजार करते रहे।

अब समय बढ़ने के बाद उनकी बेचैनी बढ़ रही है। ऐसे में ग्रामीण उन रास्तों पर भी अपनों को ढूंढने निकलने लगे हैं, जहां से बचाव संभव हो सकता था।

'ये बच्चे हो सकते हैं गढ़वाली'
अगस्त्यमुनि के सामाजिक कार्यकर्ता डा.कैलाश जोशी का दावा है कि ग्रामीणों ने त्रियुगीनारायण कोटी के जंगली रास्ते की ओर गौरी गांव के पीछे जहां-तहां 41 बच्चों के शव देखे गए हैं।
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देखने में ये बच्चे गढ़वाली लग रहे हैं। उनके पास मोबाइल से खींचे फोटोग्राफ और वीडियो फुटेज भी है।

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वे बताते हैं कि एक बच्चा तो बचने के लिए चट्टान से लटक गया था, लेकिन उसी स्थिति में उसकी मौत हो गई। डा.जोशी के कथन को खारिज नहीं किया जा सकता।

उनके अनुसार ये बच्चे 15 से 22 वर्ष के बीच के लग रहे हैं। यही वह उम्र है जब बच्चे हाईस्कूल और इंटर कर रहे होते हैं।

छुट्टियों के दौरान यहां काम करते होंगे
यात्रा सीजन के दौरान ही छुट्टियां होने से ये बच्चे होटलों और घोड़े-खच्चर वालों के यहां काम करते रहे होंगे। अमूमन यात्रा सीजन में पहाड़ के बच्चे ऐसा काम करते ही हैं।

समाज विज्ञानी देवेंद्र बुड़ाकोटी का कहना है कि पहाड़ के सामाजिक जीवन का तानाबाना ही ऐसा है कि यहां बच्चे यात्रा सीजन में आमतौर पर काम करते हुए देखे जा सकते हैं।

ऐसे में इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ये वही बच्चे होंगे, जो काम के लिए केदारघाटी में गए होंगे। जान बचाने के लिए वे गौरी गांव के जंगल के रास्ते भागे होंगे।
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