लोहता के भीटी गांव के 22 साल के कुम्हार मोनू प्रजापति ‘लोकल के लिए वोकल बनना है’ की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील से बेहद उत्साहित हैं। उन्हें लगता है कि पीएम की अपील अगर लोगों के दिलों में उतर गई तो निश्चित ही उनके जैसे हजारों कु म्हारों के परिवारों की दिवाली भी रोशन हो जाएगी।
मोनू का यह पुश्तैनी कारोबार है। पांच पीढ़ियों से उनके घर में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम हो रहा है। मिट्टी के दीये के अलावा मिट्टी के बर्तन, खिलौने आदि भी आर्डर पर बनाए जाते हैं। अकेले भीटी गांव में ही कुम्हारों के 50 से अधिक परिवार हैं, जो इस व्यवसाय से जुड़े हुए हैं। इनकी रोजी-रोटी का एकमात्र जरिया भी यही है। मगर कोरोना महामारी के बाद से बाजार में मांग कम होने से संकट और गहरा गया है।
मोनू बताते हैं कि मिट्टी की कीमत बढ़ने से उत्पादों की लागत बढ़ रही है, मगर बाजार में उचित मूल्य न मिलने से मुनाफा बेहद कम हो गया है। कई दफा तो लागत मूल्य से कम कीमत पर भी उत्पादों को बेचना पड़ता है।
दीपावली पर डिजाइनर दीयों की मांग बढ़ी
बाजार में ब्रांडेड कंपनियों के दीयों की भरमार के बाद भी मिट्टी के दीयों की अच्छी खपत है। पिछले साल की अपेक्षा इस साल दीयों की मांग बढ़ी है। खासकर डिजाइनर दीयों को नया बाजार मिला है। दीयों के अलावा स्थानीय बाजार में फूलदान, मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन एवं खिलौनों की भी मांग है।
संत रविदास शिक्षा एवं विकास संस्थान से जुड़े राजेश त्रिवेदी सालों से मिट्टी से तैयार सामानों की बाजार में ब्रांडिंग कर रहे हैं। राजेश बताते हैं, स्थानीय कारीगरों और कुम्हारों को सरकार से थोड़ा प्रोत्साहन मिल जाए तो इनकी जिंदगी में भी उजाला हो जाए। राजेश कहते हैं, बनारस में तैयार मिट्टी के बर्तनों, खिलौनों और मूर्तियों की दुनिया भर में मांग है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि जो कारीगर इसे अपना पसीना बहाकर तैयार करते हैं, उन्हें उसकी सही कीमत नहीं मिल पाती। तमाम कंपनियां ब्रांडिंग कर मुनाफा कमा रही हैं।