दाराशिकोह के चार भाई शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श थे। पिता शाहजहां दाराशिकोह को चारों भाइयों की तुलना में ज्यादा प्यार दाराशिकोह को स्नेह करता था। 1642 में उसने दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 1645 में उसे इलाहाबाद का सूबेदार (राज्यपाल) बनाया गया। बताते हैं कि उसी समय वह बनारस आया था और यहीं संस्कृत सीखी। उसने संस्कृत के अनेक ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी किया था। उसकी कला-साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति अधिक रुचि थी। उसकी गणना विद्वानों में की जाती थी।
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दाराशिकोह ने बनारस में पंडितों के साथ मिलकर उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। जिसका नाम सिर्र-ए-अकबर था। योगवशिष्ट का भी उसने अनुवाद किया था। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में राजनीतिशास्त्र के अध्यक्ष रहे प्रो. सतीश राय बताते हैं कि दाराशिकोह को पं. कमलापति त्रिपाठी के पूर्वज रामानंदपति त्रिपाठी ने संस्कृत सिखाई थी। दाराशिकोह की हत्या के बाद इनका परिवार काफी भयभीत था।
औरंगजेब ने कराई थी दाराशिकोह की हत्या
1615 में जन्मे दाराशिकोह की निर्मम हत्या उसके भाई औरंगजेब ने 1659 में कराई थी। शाहजहां के बीमार पड़ते ही सत्ता का संघर्ष शुरू हो गया। औरंगजेब नहीं चाहता था कि उसके तीनों भाइयों में से कोई भी गद्दी पर बैठे। इसलिए उसने सबकी हत्या करा दी। औरंगजेब ने दाराशिकोह की एक पत्नी को अपने हरम में रखा था। दाराशिकोह के बेटे सुलेमान शिकोह को ग्वालियर के जेल में डाल दिया गया। बाद में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी। उसे डर था कि जेल से भागकर सुलेमान सत्ता का दावेदार बन सकता है।
दाराशिकोह के ही नाम पर पड़ा दारानगर
माना जाता है कि बनारस का दारानगर मोहल्ला दाराशिकोह के नाम पर पड़ा। कुछ मानते हैं कि दाराशिकोह वहीं रहता था लेकिन दालमंडी क्षेत्र के रहने वाले और विद्वान मानते हैं कि वह काजीपुरा कलां में रहता था।