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Exclusive: दालमंडी में रहता था दाराशिकोह, यहीं थी पुरानी अदालत; काशी में सीखी थी संस्कृत; पढ़ें- अनसुने किस्से

Fri, 07 Nov 2025 09:41 PM IST
प्रगति चंद अनिरुद्ध पांडेय, अमर उजाला, वाराणसी।

सार

Varanasi News: दाराशिकोह दालमंडी के पुरानी अदालत की मरम्मत कराकर यहीं रहता था। उसने बनारस में ही संस्कृत सीखी थी। उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। आइए इस खबर के जरिए दालमंडी के किस्से जानते हैं।  
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पुरानी अदालत का खंडहर हुआ गेट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मुगल बादशाह शाहजहां का बड़ा बेटा और औरंगजेब का भाई दाराशिकोह दालमंडी के काजीपुरा कलां में रहता था। यहीं बारादरी थी और अदालत भी यहीं लगती थी, जिसे पुरानी अदालत के नाम से जाना जाता था। यहीं पास में फांसी घर भी था। कुछ साल पहले तक तो पुरानी अदालत का भवन था लेकिन अब उसका अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है और अब उसे जानने वाले भी कम लोग रह गए हैं। जहां पुरानी अदालत थी अब वहां नए-नए भवन बन गए हैं।

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पुरानी अदालत में रहने वाले 81 वर्षीय महमूद अशरफ बताते हैं कि इब्राहीम लोदी के दौर से पुरानी अदालत का भवन था। इसकी मरम्मत करवाकर यहां दाराशिकोह रहा करता था। यहीं उसने संस्कृत सीखी थी। संस्कृत पढ़ने वह औरंगाबाद जाया करता था। बाद में यहां अदालत लगने लगी जहां काजी और काजी-उल-अकदा (जज और मुख्य जज) बैठते थे। इसलिए इसे पुरानी अदालत कहते हैं। इसके बड़े-बड़े मुख्य द्वार थे, जिसे तोड़ दिया गया। मुख्य द्वार के आगे बाग हुआ करता था। अंग्रेजों ने बदलकर दूसरी अदालत बनवाई। काजी यानी जज के रहने के कारण इस क्षेत्र का नाम काजीपुरा पड़ा होगा बाद में इसे काजीपुरा कलां के नाम से जाना गया।

काजीपुरा कला के रहने वाले बिल्डर असकरी रजा सईद बताते हैं कि पास में ही फांसी घर भी था। पुरानी अदालत के समय के तीन द्वार खंडहर के रूप में अब भी यहां विद्यमान हैं। लाखौरी ईंट से बने इस द्वार को दाराशिकोह का बनवाया हुआ माना जाता है। आज उस स्थान पर तमाम दुकानें बन गईं। असकरी रजा कहते हैं कि इन द्वारों को संरक्षित किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया तो इतिहास और तत्कालीन समय की गवाही देने वाले ये द्वार भी समाप्त हो जाएंगे।

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दाराशिकोह के चार भाई शाह शुजा, औरंगजेब और मुराद बख्श थे। पिता शाहजहां दाराशिकोह को चारों भाइयों की तुलना में ज्यादा प्यार दाराशिकोह को स्नेह करता था। 1642 में उसने दाराशिकोह को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। 1645 में उसे इलाहाबाद का सूबेदार (राज्यपाल) बनाया गया। बताते हैं कि उसी समय वह बनारस आया था और यहीं संस्कृत सीखी। उसने संस्कृत के अनेक ग्रंथों का फारसी में अनुवाद भी किया था। उसकी कला-साहित्य और भारतीय संस्कृति के प्रति अधिक रुचि थी। उसकी गणना विद्वानों में की जाती थी।

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पं. रामनंदपति त्रिपाठी ने सिखाई थी संस्कृत

दाराशिकोह ने बनारस में पंडितों के साथ मिलकर उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। जिसका नाम सिर्र-ए-अकबर था। योगवशिष्ट का भी उसने अनुवाद किया था। महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में राजनीतिशास्त्र के अध्यक्ष रहे प्रो. सतीश राय बताते हैं कि दाराशिकोह को पं. कमलापति त्रिपाठी के पूर्वज रामानंदपति त्रिपाठी ने संस्कृत सिखाई थी। दाराशिकोह की हत्या के बाद इनका परिवार काफी भयभीत था।

औरंगजेब ने कराई थी दाराशिकोह की हत्या
1615 में जन्मे दाराशिकोह की निर्मम हत्या उसके भाई औरंगजेब ने 1659 में कराई थी। शाहजहां के बीमार पड़ते ही सत्ता का संघर्ष शुरू हो गया। औरंगजेब नहीं चाहता था कि उसके तीनों भाइयों में से कोई भी गद्दी पर बैठे। इसलिए उसने सबकी हत्या करा दी। औरंगजेब ने दाराशिकोह की एक पत्नी को अपने हरम में रखा था। दाराशिकोह के बेटे सुलेमान शिकोह को ग्वालियर के जेल में डाल दिया गया। बाद में औरंगजेब ने उसकी हत्या करवा दी। उसे डर था कि जेल से भागकर सुलेमान सत्ता का दावेदार बन सकता है।
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दाराशिकोह के ही नाम पर पड़ा दारानगर
माना जाता है कि बनारस का दारानगर मोहल्ला दाराशिकोह के नाम पर पड़ा। कुछ मानते हैं कि दाराशिकोह वहीं रहता था लेकिन दालमंडी क्षेत्र के रहने वाले और विद्वान मानते हैं कि वह काजीपुरा कलां में रहता था।

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