गाजीपुर। गंगा की करइल, बांगर और बांड़ वाले इलाके को संजोए मुहम्मदाबाद विधानसभा सीट की एक अलग पहचान रही है। यहां पिछले दो दशक से दो परिवारों के बीच राजनीतिक वर्चस्व का घमासान जारी है। इस बार भी एक तरफ भाजपा के पूर्व विधायक कृष्णानंद राय का परिवार और दूसरी तरफ वर्तमान सांसद अफजाल अंसारी व बाहुबली विधायक मुख्तार अंसारी का परिवार है। भाजपा से अलका राय और सपा के टिकट पर पूर्व विधायक सिबगतुल्लाह अंसारी के बेटे मन्नू अंसारी मैदान में हैं। इनके अलावा बसपा से माधवेंद्र राय, कांग्रेस से अरविंद किशोर राय चुनाव लड़ रहे हैं। बावजूद इसके लड़ाई भाजपा और सपा के प्रत्याशियों के बीच ही है।
इस सीट पर कभी कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी का कब्जा रहा है। कांग्रेस से विजय शंकर सिंह और कम्युनिस्ट पार्टी से अफजाल अंसारी लगातार विधायक रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे पूर्वांचल में दोनों धाराएं कमजोर पड़ती गईं, अन्य जगहों की तरह यहां भी सपा, भाजपा और बसपा के प्रत्याशियों का जनाधार मजबूत होता गया। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की अलका राय ने 33 हजार वोटों से जीत दर्ज की थी। तब बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे सिबगतुल्लाह पराजित हुए। वहीं, सपा और कांग्रेस गठबंधन के रामजनक कुशवाहा ने दस हजार का आंकड़ा भी पार नहीं किया। उस चुनाव में भाजपा को भूमिहार, ठाकुर, ब्राह्मण वोटों के साथ प्रतिक्रिया में कुछ यादव वोट भी मिला था। जिसकी चर्चा आज की राजनीति के पंडित गाहे-बगाहे करते हैं।
इस बार का मुकाबला भाजपा प्रत्याशी के लिए कड़ा है, क्योंकि सपा से मन्नू अंसारी के प्रत्याशी बनने से एक बड़ा वोट बैंक यादवों का मिला है। जो मुस्लिम मतदाताओं के साथ सटने पर भारी-भरकम आंकड़ा प्रस्तुत करता है। एक के खिलाफ एक लाख पंद्रह हजार भूमिहार मतदाताओं का एकसाथ भाजपा का साथ देना और अन्य वोटों पर मजबूत पकड़ रखना ही रास्ता हो सकता है। लेकिन बसपा और कांग्रेस से भूमिहार प्रत्याशी मैदान में होने से भूमिहार वोट कितना भाजपा को मिलता है। ऐसे में इस सीट पर फिर से भाजपा और सपा प्रत्याशी के बीच कड़ा मुकाबला है। (संवाद)
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2017 के विधानसभा चुनाव में
भाजपा - अलका राय - 122156
बसपा - सिबगतुल्लाह अंसारी - 89429
कांग्रेस - जनक कुशवाहा - 9910
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वोटों का गणित
कुल मतदाता- 420272
पुरुष- 227137
महिला- 193102
जातिगत समीकरण
भूमिहार - एक लाख पंद्रह हजार
अनुसूचित जाति - 60 हजार
यादव - 45 हजार
मुस्लिम - 30 हजार
ब्राह्मण - 22 हजार
राजपूत - छह हजार
कुशवाहा - 20 हजार
बिंद - 12 हजार
प्रत्याशियों की मजबूती
मन्नू अंसारी की मजबूती के पीछे पिता सिबगतुल्लाह के वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव को भी आंका जा रहा है। क्योंकि कौमी एकता दल (कौएद) से लड़कर सिबगतुल्लाह ने करीब 60 हजार वोट पाए थे। इस बार सपा का यादव वोट, मुस्लिम वोट उनके साथ है। ऐसे में माना जाता है कि अंसारी परिवार का इस सीट पर 30 से 40 हजार के करीब अपना वोट है। जिसमें हर जाति वर्ग के लोग हैं। दूसरी ओर एक लाख पंद्रह हजार भूमिहार वोटों पर भाजपा अपना दावा करती है। जो भाजपा प्रत्याशी की मजबूत कड़ी है। इसके अलावा ब्राह्मण, बिंद, कुशवाहा और राजपूत वोटों को भाजपा के लिए बड़ी जरूरत है।
कृष्णानंद राय परिवार और अंसारी बंधु का चुनावी सफर
मुहम्मदाबाद सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी से अफजाल अंसारी पांच बार वर्ष 1985, 1989, 1991, 1993 और 1996 विधायक रहे हैं। अंसारी परिवार ने जब सपा का दामन थामा तो 2007 में सिबगतुल्लाह विधायक चुने गए। इसके बाद 2012 में कौमी एकता दल से एक बार फिर विधायक बने। जिसमें 2002 के चुनाव में भाजपा के कृष्णानंद राय से हार के बाद खलल हुई। इसके बाद भाजपा से कृष्णानंद राय एक बार और उनकी पत्नी अलका राय 2006 और 2017 में दो बार विधायक बनीं। 2005 में तत्कालीन विधायक कृष्णानंद राय की हत्या होने के बाद मुहम्मदाबाद सीट लगातार सुर्खियों में बना रहता है।
बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी कितने कारगर
बसपा से माधवेंद्र राय पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं। उनके पिता वीरेंद्र राय यहां से तीन बार चुनाव लड़े हैं। 1993 में कांग्रेस से, 1996 में बसपा से लड़े थे। जिसमें अफजाल और उनके बीच मुकाबला था। फिर 2002 में निर्दल उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़े थे। बसपा का कोर वोट होने के बावजूद यहां उसके उम्मीदवार अधिकांश चुनाव में 25 से 30 हजार वोट ही पाए हैं। जिसके पीछे करइल क्षेत्र के हरिजनों का अफजाल से प्रभावित और बांगर क्षेत्र के हरिजनों का बसपा समर्थित बताया जाता है। वहीं कांग्रेस के प्रत्याशी अरविंद किशोर राय गंगा पार रेवतीपुर के रहने वाले है। 2012 में वह पहली बार चुनाव लड़े थे। अब दूसरी बार फिर मैदान में हैं।
मतदाताओं के शांत होने से अंदाजा मुश्किल
यहां पूरी लड़ाई भाजपा बनाम सपा है। भाजपा की मजबूती यहां सबसे अधिक भूमिहार वोट हैं। लेकिन कई भूमिहार प्रत्याशी मैदान में होने के साथ उनमें खेमेबाजी से भाजपा को नुकसान पहुंचता दिख रहा है। इस सीट पर चुनाव जिताने और हराने में यादव और अनुसूचित वोट कारगर भूमिका अदा करेंगे। क्योंकि पिछली बार बसपा से सिबगतुल्लाह लड़े थे और सपा-कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस प्रत्याशी मैदान में था। जिससे नाराज यादवों का वोट अलका राय को मिला था। लेकिन इस बार खासतौर पर ओबीसी और अनुसूचित मतदाता काफी शांत हैं। जिससे स्थितियों का अंदाजा लगा पाना मुश्किल है।