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भगवद्गीता से टूटा नागरी के रंगमंच का सन्नाटा

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भगवद्गीता के मंचन ने डेढ़ साल से नागरी नाटक मंडली के रंगमंच पर पसरे सन्नाटे को दूर किया। पेंटिंग्स से पौराणिक काल का आभास कराने का प्रयोग नृत्य-नाट्य प्रस्तुति की विशिष्टता रही। नाटक का करीब 70 फीसदी हिस्सा भरतनाट्यम शैली की नृत्य भंगिमाओं में मुखर हुआ। दर्शकाें ने भी लंबे अंतराल के बाद रंगमंच की प्रस्तुति देख कर सुकून महसूस किया।
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रविवार को नागरी नाटक मंडली में आठ दिवसीय 20वें अश्विन नाट्य महोत्सव की शुरूआत हुई। महोत्सव का उद्घाटन संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ सांस्कृतिक समीक्षक पं. अमिताभ भट्टाचार्य और साहित्यकार डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र उपस्थित रहे। महोत्सव के पहले दिन महाभारत के सर्वकालिक प्रसंग से संदर्भित नाट्य प्रयोग ‘भगवद्गीता’ का मंचन हुआ। मार्च 2020 में लॉकडाउन के बाद से पहला मौका था जब मुरारी लाल मेहता प्रेक्षागृह रंग दर्शकों के लिए खुल गया।
मेजबान नागरी नाटक मंडली की प्रस्तुति ‘भगवद्गीता’ में कथानक के अनुरूप दृश्यों में तो भव्यता तो रही लेकिन कमजोर संवाद से दर्शकों को कुछ कमी का अहसास भी हुआ। सुमन पाठक ने द्रौपदी और रंगकर्मी विजय बहल ने महर्षि वेदव्यास के चरित्र को साकार किया। युद्ध के लिए स्वयं को कारण मान अग्निकुंड की ओर बढ़ती द्रौपदी के अंतरद्वंद को चित्रकला से रेखांकित किया गया। मंच पर सूत्रधार-प्रेमचंद होम्बल, सूत्रधार/संजय- दिनेश श्रीवास्तव, दुर्योधन-बृजमोहन यादव, अर्जुन-अभिषेक त्रिपाठी, श्रीकृष्ण-कर्मवीर सिंह। नृत्य-हर्षिता, क्षिति, ज्योति, अनुष्का, जागृति, दोवोलिना, श्वेत, वसंत, अमित, विनय, रामबाबू, रतन।
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महोत्सव में आज
नाटक-चौरी चौरा संग्राम, संस्था- थियेटरवाला, लेखक एवं निर्देशक-रामजी बाली, समय-सायं-07 बजे
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