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नवजागरण के अग्रदूत ने साहित्य को दी आधुनिक हिंदी

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आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हिंदी का स्वरूप बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज का हिंदी साहित्य जहां खड़ा है, उसकी नींव का ज्यादातर हिस्सा भारतेंदु और उनकी मंडली ने निर्मित किया था। आलोचक उन्हें हिंदी साहित्य का अनुसंधानकर्ता भी मानते हैं। उन्होंने न केवल नई विधाओं का सृजन किया बल्कि हिंदी साहित्य की विषयवस्तु में नयापन लेकर आए। भारतेंदु परिवार की पांचवीं पीढ़ी के दीपेश चंद्र चौधरी ने बताया कि भारतेंदु हरिश्चंद्र का योगदान अविस्मरणीय है। 34 साल चार महीने की आयु में दुनिया को अलविदा कहने से पहले वह हिंदी जगत के लिए इतना कुछ कर गए कि हैरत होती है कि कोई इंसान इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ कैसे कर सकता है। उनके साथ ‘पहली बार’ वाली उपलब्धि जितनी बार जुड़ी है, उतनी बहुत ही कम लोगों के साथ जुड़ पाती है। उन्हें भारत में नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है। उनसे पहलेे हिंदी साहित्य में मध्यकाल की प्रवृत्तियां मौजूद थीं। साहित्य का पूरा माहौल प्रेम, भक्ति और अध्यात्म का था। उन्होंने हिंदी साहित्य को देश की संस्कृति की खूबियों के साथ-साथ पश्चिम की भौतिक और वैज्ञानिक सोच से लैस करने की भरसक कोशिश की। लेखनी से लोगों में अपनी संस्कृति और हिंदी भाषा के प्रति प्रेम की अलख जगाने का प्रयास किया। भारतेंदु बाबू ने भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, अलगाववाद, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याओं को अपने नाटक, प्रहसन और निबंधों का विषय बनाया। आलोचकों का कहना है कि उनका सबसे बड़ा योगदान हिंदी भाषा को नई चाल में ढालने का है। उनसे पहले हिंदी भाषा में राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृत निष्ठ हिंदी और राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की फारसी निष्ठ शैली का इस्तेमाल होता था। हरिश्चंद्र ने इन दोनों प्रवृत्तियों का समावेश किया। उन्होंने अपनी पत्रिका ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ में 1873 से हिंदी की नई भाषा को गढ़ना शुरू किया। उन्होंने कठिन शब्दों का प्रयोग वर्जित कर दिया। भाषा के इस रूप को हिंदुस्तानी शैली कहा गया, जिसे बाद में प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने विस्तार दिया। बावजूद इसके कविता में वह खड़ी बोली के बजाय ब्रज का ही इस्तेमाल करते रहे।
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पहली बार की हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना
भारतेंदु हरिश्चंद्र का सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंग मंच क्षेत्र में रहा। उन्होंने पहली बार हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की। मौलिक और अनूदित मिलाकर उन्होंने 17 नाटकों की रचना की। रंगमंच में भी कई प्रयोग किए। ऐसे में उन्हें हिंदी का पहला आधुनिक नाटककार और मौलिक नाट्य चिंतक कहा जाता है। साथ ही हिंदी नाटक का युग प्रवर्तक भी उन्हें कहा गया।
सुमित श्रीवास्तव, नाट्य निर्देशक
स्थापित किया हिंदी रंगमंच
भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिखे भारत दुर्दशा, अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति जैसे नाटकों का मंचन आज भी हो रहा है। उन्होंने पारसी और पश्चिमी थिएटर के प्रभाव को दूर कर हिंदी रंगमंच स्थापित किया। उन्होंने नाटक के कथानक को काफी विविध स्वरूप दिया। हिंदी में पहली बार प्रहसन लिखने की शुरुआत भी भारतेंदु हरिश्चंद्र ने की। इससे समाज की समस्याओं पर व्यंग्य के जरिये करारा प्रहार किया। उनके दौर को भारतेंदु युग कहा जाता है। खासकर नाटक व रंगमंच को उन्होंने नई राह दिखाई।
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रामजी बाली, केंद्र निदेशक, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा
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