देवोत्थान एकादशी पर श्री हरि विष्णु निद्रा से जागेंगे। वर्ष की सभी 24 एकादशी में सबसे महत्वपूर्ण हरि प्रबोधिनी एकादशी 14 नवंबर प्रात: 8.41 बजे लग जाएगी और 15 नवंबर को प्रात: 8.33 बजे तक रहेगी। सूर्योदय व्यापिनी तिथि को ध्यान में रखकर हरि प्रबोधिनी एकादशी व्रत का मान 15 को ही होगा।
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काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पं. दीपक मालवीय ने बताया कि देवोत्थान एकादशी के चार दिन बाद 19 नवंबर से शहनाई गूंजने लगेगी। नवंबर में लग्न के लिए छह और दिसंबर में पांच मुहूर्त हैं। 14 दिसंबर से खरमास आरंभ हो जाएगा और 15 जनवरी से लग्न शुरू हो जाएगी।
अत: सूर्योदय व्यापिनी एकादशी होने के कारण देवोत्थान एकादशी व्रत का मान सभी के लिए 15 नवंबर को होगा। इस दिन प्रात: 8:52 तक भद्रा है और भद्रा के पश्चात ही तुलसी एवं शालिग्राम विवाह उत्सव के कार्यक्रम संपन्न किए जाएंगे।
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भीष्म पंचक व्रत
पौराणिक कथाओं के अनुसार जिस मनोरथ का फल त्रिलोक में न मिल सके वह देवोत्थान एकादशी का व्रत कर प्राप्त किया जा सकता है। ज्योतिषाचार्य विमल जैन ने बताया कि देवउठनी एकादशी से भीष्म पंचक व्रत भी रखा जाता है।
चार महीने बाद विश्राम कर इस एकादशी को भगवान विष्णु जागते हैं इसके साथ ही सभी मांगलिक कार्य एकादशी के बाद से प्रारंभ हो जाते हैं। दीपक मालवीय ने बताया कि 23 फरवरी से गुरु अस्त हो जाएगा। जिसके कारण विवाह मुहूर्त नहीं होंगे। खरमास के पश्चात 17 अप्रैल 2022 से विवाह के मुहूर्त बनेंगे।