इसके बाद रोबोटिक तकनीक का सहारा लिया गया। इससे भी पूरी तरीके से सफलता नहीं मिल पाई। कारण यह कि इस तकनीक से वाटर फ्लो के जरिए जानकारी मिलती है। फिलहाल, बेनियाबाग में लोहे के पाइप लगाकर सफाई चल रही है और काम अब भी अधूरा है।
जल निगम के मुख्य अभियंता एके पुरवार ने बताया कि मंडुवाडीह से दशाश्वमेघ तक के शाही नाले की सफाई हो चुकी है। अस्सी से खिड़कियां घाट वाले नाले की सफाई का काम करीब डेढ़ किलोमीटर बचा है। इसे जल्द पूरा कराया जाएगा।
कुंडों पर कब्जा के चलते जाम हुआ शाही नाला
सपा नेता मनोज राय धूपचंडी ने बताया कि शाही नाला की दुर्दशा कुंडों पर कब्जा करने के चलते हुई। पहले शहर के सभी जलाशय इस नाले से जुड़े हुए थे। इसी के चलते पानी निकल जाता था और जलभराव व सीवर ओवर फ्लो की समस्या नहीं आती थी। बाद में इन पर कब्जे होते चले गए। इसी का खामियाजा जनता भुगत रही है। बीते 25 सालों से नगर निगम में भाजपा की ‘सरकार’ है। इसके बावजूद शाही नाला सही नहीं हो पाया।
शाही नाले की सफाई 1700 मीटर शेष
शाही नाले की अस्सी से लेकर कोनिया के आगे खिड़किया घाट तक लंबाई 7.12 किलोमीटर बताई जा रही है। अभी दो फेज में कुल 17 सौ मीटर की सफाई शेष है। इसके लिए दिसंबर 2019 अंतिम तारीख दी गई थी, लेकिन अभी काम अधूरा है। अब बताया जा रहा है कि काम पूरा होने में दिसंबर लगेगा। नाले की गोलाई की परिधि के सापेक्ष व्यास अस्सी पर अपस्ट्रीम में चार फीट और डाउनस्ट्रीम कोनिया में आठ फीट है।
अब तक 92 करोड़ हो चुके हैं खर्च
शाली नाले की सफाई पर 92 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई की निगरानी में जापान इंटरनेशनल को-आपरेशन एजेंसी (जायका) काम कर रही है। 2015 से शुरू हुआ काम 2017 में पूरा होना था, लेकिन अगस्त 2020 बीतने के बाद भी काम चल रहा है।
जब नाला बना तब आबादी थी सिर्फ एक लाख अस्सी हजार
आर्टिटेक्ट बताते हैं कि जब शाली नाला बनाया गया था, तब बनारस की आबादी महज एक लाख अस्सी हजार थी। अब आबादी 38 लाख से ज्यादा है। दो सौ साल बाद भी ड्रैनेज सिस्टम के काम करने से इंजीनियर भी हैरान हैं।