काशी विश्वनाथ मंदिर से करीब आधा किलोमीटर दूर चौक क्षेत्र के सिद्धेश्वरी गली में ये मंदिर है। मंदिर के पुजारी अंकित मिश्रा ने बताया कि शिवलिंग के ऊपर एक बड़ा सा छेद है उसी से लोग दर्शन करते हैं। इस मंदिर के अंदर जाने वाले रास्ते को साल में बस शिवरात्रि के दिन एक बार खोला जाता है और उस दिन विधिवत रुद्राभिषेक भी किया जाता है। दर्शनार्थियों की सुरक्षा के लिए यह मंदिर बंद रहता है क्योंकि मंदिर परिसर का रास्ता काफी पुराना और जर्जर है।
काशी खंड के अनुसार भगवान शिव के काशी आगमन के पश्चात काशी के सिद्धेश्वरी पीठ के निकट पितामहेश्वर नामक लिंग है। पितामहेश्वर साढ़े आठ करोड़ तीर्थों सहित गया तीर्थ से काशी आए हैं। परमपिता ब्रह्मा की तपस्या से भगवान शिव प्रकट हुए थे और उन्होंने पितामहेश्वर के रूप में भक्तों का कल्याण करने का आशीर्वाद दिया था।
काशी में पितामहेश्वर नामक लिंग की सहर्ष पूजा और पिंडदान करने से 21 कुलों के साथ मनुष्य निसंदेह मुक्त हो जाता है। वहीं पर पितामहस्रोती नामक तीर्थ भी है और वहां पर श्राद्ध करने से गया में श्राद्ध का फल मिलता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यह मंदिर काफी प्रसिद्ध है। लोग यह जानने के लिए सबसे अधिक आते हैं कि छोटे से छिद्र से कैसे 40 फीट नीचे बाबा का जलाभिषेक और उनके दर्शन होते हैं। मंदिर के अंदर पिता महेश्वर महादेव और उनके ऊपर स्वर्ण सर्प विराजमान हैं। पुजारी परिवार के सदस्य तीन पहर इस मंदिर में पूजा पाठ भोग लगाते हैं। इसके अलावा किसी को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता है। मंदिर के नीचे जाने के लिए एक पतली सी सीढ़ी है।