संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत ने कहा है कि जिसने संस्कृत शिक्षा प्राप्त कर ली वह देश की किसी भी मातृभाषा में प्रवीणता पा सकेगा, संस्कृति को पुनर्जीवित करने के लिए संस्कृत को आत्मभाव से अपनाना होगा। संस्कृत में चिंतन पाठन एवं संस्कृत के लिए ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए। भारतीय ज्ञान परंपरा और विचारधारा संस्कृत में निहित है।
वह सोमवार को संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय व उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में पाणिनी भवन सभागार में आयोजित शोध परियोजना कार्यशाला के समापन समारोह को संबोधित कर रहे थे। विशिष्ट अतिथि उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ के अध्यक्ष डॉ. वाचस्पति ने कहा कि संस्कृत को आमजन की भाषा बनाने का प्रयास है। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि शोध परियोजना कार्यशाला संस्कृत, संस्कृति और संस्कार की ज्ञान राशि से जनोपयोगी बनाएं। संस्कृत भारतीके राष्ट्रीय महासचिव महामहोपाध्याय पद्मश्री चमू कृष्ण शास्त्री ने कहा कि जो भी शोध होते हैं उनकीउपयोगिता के विषय में जनसामान्य को अवगत कराकरप्रायोगिक रूप से शोध को उपयोगी बनाया जा सकता है। इस दौरान जेएनयू के प्रो. संतोष कुमार शुक्ल, डॉ. सुदर्शन एचएस, डॉ. आनंद, प्रो. सूर्यनारायण मूर्ति गंती ने विचार व्यक्त किए। इस दौरान प्रो. हरिशंकर पांडेय, डॉ. रविशंकर पांडेय, प्रो. शैलेश कुमार मिश्र ने किया।