वनस्पति विज्ञान विभाग में हुए शोध के बारे में प्रो. शशि पांडेय ने बताया कि ऋष्यगंधा सामान्य रूप से अफगानिस्तान, पाकिस्तान और भारत के शुष्क एवं गर्म स्थानों पर पाया जाता है। इसको पनीर का फूल कहे जाने का कारण उसके बीजों में उपस्थित प्रोटीएज द्वारा दूध से पनीर बनाने की क्षमता होती है।
यह औषधीय गुण इसमें उपस्थित जैव सक्रिय रसायनिक टर्पेनॉयड्स यौगिकों जैसे विथानोलॉयड्स एवं कोअगुलिनोलॉयड्स के कारण होते हैं। परंतु इसके लापरवाहीपूर्ण रख-रखाव एवं अनियमित प्रयोग के कारण आज यह संकट ग्रस्त पौधों की श्रेणी में सम्मलित हो चुका है।
अब तक शोध के जो परिणाम आए हैं, उसका प्रकाशन शोध पत्रिकाओं मैटेरियल साइंस एंड इंजीनियरिंग सी, प्लांट सेल रिपोर्ट्स एवं फिजियोलॉजी एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ऑफ प्लांट्स में किया जा चुका है। शोध करने वाली टीम में विपिन मौर्या, लकी शर्मा, स्नेहा आदि शामिल हैं।
वनस्पति विज्ञान विभाग की प्रोफेसर शशि पांडेय ने बताया कि आठ साल पहले शोध छात्रा दीपिका त्रिपाठी के साथ प्रयोग शुरू किया था। सबसे पहले प्रयोगशाला में ही कृत्रिम ऊतक संवर्धन विधि द्वारा संकट ग्रस्त पौधे ऋ ष्यगंधा के उत्पादन को बढ़ाया गया।
इसके साथ ही उन पौधों से सूक्ष्म नैनोकणों का संश्लेषण/निर्माण किया गया। मॉलिक्यूलर एंड ह्यूमन जेनेटिक्स विभाग के प्रो. जीनरायण के साथ शोध को आगे बढ़ाते हुए यह भी पाया कि संश्लेषित नैनोकणों में उच्च रूप से सरवाईकल कैंसर के प्रति निदान की क्षमता है।
भविष्य में इस विधि (नैनो-जैवप्रोद्योगिकी) द्वारा न केवल ऋष्यगंधा की संकट ग्रस्त स्थिति मे सुधार किया जाना संभव हो सकेगा बल्कि उसके औषधीय गुणों के उत्पादन में भी बढ़ावा मिलेगा, जिसका उपयोग मानव जीवन में विभिन्न प्रकार के रोगों को ठीक करने में संभव हो सकेगा।