सदियों पुराना है गुदना का प्रचलन।
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प्राचीन संस्कृति में पुरुष भी गुदना गुदवाते थे। अध्ययन में मिले साक्ष्यों से पता चला है कि खरवार जनजाति के पुरुष हाथों पर बिच्छू या सर्प आदि विषैले जीव जंतुओं की आकृति बनवाते थे। इसके पीछे मान्यता थी कि वे विषैले जंतुओं को सम्मान दे रहे हैं, जिससे वे उन पर अब हमला नहीं करेंगे। इसी तरह ओरांव जनजाति की महिलाओं के माथे के बीचोबीच तीन धारियां और कुछ बिंदियों वाला गुदना मिलता है। जो उन महिलाओं के योद्धा होने का प्रमाण देता है। ऐसी महिलाओं को ‘दई’ कहा जाता था।
विकास के साथ संस्कृति का हुआ आदान-प्रदान
प्रीति रावत बताती हैं कि समय के साथ गुदना संस्कृति का एक्सचेंज हुआ। सासाराम में ताराचंडी मंदिर के आसपास के इलाके में सर्वे के दौरान गोंड कम्यूनिटी की औरतों के हाथ में एक जैसा गुदना दिखा। फिर वैश्य समुदाय की औरतों के हाथ में भी वैसा ही जालीनुमा आकृति वाला गुदना दिखा।
क्या कहते हैं जानकार
प्राचीन भारतीय समाज में गुदना का खास महत्व रहा है। संतानोत्पत्ति से लेकर मृत्यु तक लोक परंपरा में गुदना की मान्यता रही है। उस समय महिला-पुरुष दोनों के शरीर पर मोटे और बड़े गुदना गुदवाने के साक्ष्य मिलते हैं। - डॉ. सचिन कुमार तिवारी, पुरातत्वविद्, बीएचयू