इस समय पूरी दुनिया कोरोना महामारी से जूझ रही है। ऐसे हालात में केंद्र सरकार अपने देशवासियों की सुरक्षा के लिए योजनाबद्ध तरीके से हर संभव प्रयास कर रही है। देशवासियों की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह सरकार का सहयोग करें और लॉक डाउन का पूरी तरह पालन करें। उम्मीदों का दामन न छोड़ें। संकट के बादल अवश्य छटेंगे। ये संदेश परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद महाराज ने अपने भक्तों को संदेश प्रेषित किया है।
परमहंस स्वामी अड़गड़ानंद महाराज वर्तमान में अध्यात्मिक प्रवास पर महाराष्ट्र के पालघर आश्रम में हैं। उन्होंने कहा कि आप सभी जहां भी है वहीं से यथा सामर्थ्य गरीबों एवं असहायों की मदद करें। जरूरतमंदों में अन्न दान करें। ध्यान रहे कि अन्नदान से बड़ा कोई दान नहीं होता और मानव सेवा ही सर्वोपरि है। उन्होंने केंद्र सरकार से 'यथार्थ गीता' को राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने और स्कूल-कॉलेजों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि हम उस परमात्मा की रचना हैं, जो पूरे ब्रह्मांड का नियंता है। हम उसके बच्चे हैं। वह सब कुछ अपने बच्चों के लिए करता है। हमारी कमजोरी, बीमारी, दुख, अशांति और मान, अपमान कहीं न कहीं हमारे कर्मों से जुड़े होते हैं। जन्म-जन्मांतर में जो हमने किया, उसे भुगतना ही पड़ता है। परंतु ईश्वर एक ऐसा मौका देता है जब हम अपने भाग्य को उसके सान्निध्य में लिख सकते हैं। यही वह अवसर है जब परमात्मा का स्मरण करें। घर पर रहकर आध्यात्म से जुड़ें और धर्मशास्त्र 'यथार्थ गीता' का प्रतिदिन पाठ करें।
स्वामी अड़गड़ानंद जी महाराज के बारे में
स्वामी अड़गड़ानंद महाराज ने “यथार्थ गीता” का साधारण शब्दों में व्याख्यान किया है। यह माना जाता है कि स्वामी अड़गड़ानंद अपने गुरु जी संत परमानंद के पास वर्ष 1955 के नवंबर में सत्य की खोज में आए थे, उस समय इनकी आयु 23 वर्ष की थी। स्वामी परमानंद का आश्रम चित्रकूट अनुसूया, सतना, मध्य प्रदेश, भारत के घने जंगलों में स्थित था। इन्होंने श्रीमदृभागवत गीता पर आधारित एक ग्रंथ यर्थाथ गीता की रचना की है, जो कि काफी लोकप्रिय पुस्तक है।