शैव और वैष्णव की एकता का है प्रतीक मणिमंदिर
धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज की कर्मस्थली पर निर्मित मणिमंदिर शैव और वैष्णव की एकता का प्रतीक है। मंदिर का निर्माण लगभग 43 हजार वर्गफीट में किया गया है। इसमें भगवान राम के दरबार के साथ ही शिव, शक्ति और पंचदेवों के दर्शन एक साथ होते हैं। 151 नर्मदेश्वर शिवलिंगों की कतार है। बगल में शिव परिवार और स्फटिक मणि के द्वादश ज्योतिर्लिंग, परिक्रमा पथ पर अगले हिस्से में सूर्यदेव व बाबा कालभैरव और पिछले हिस्से में एक तरफ गजानन तो दूसरी तरफ मां दुर्गा अभयदान की मुद्रा में कृपा बरसाती हैं। राम दरबार के बगल में मां अन्नपूर्णा की स्वर्ण प्रतिमा श्रद्धालुओं को धन-धान्य का वरदान देती हैं। मेंहदीपुर बालाजी भी श्रद्धालुओं का कष्ट हरते हैं।
ऐसे तैयार होती है महाकाल की आरती के लिए भस्म
भस्म आरती भगवान शिव को जगाने के लिए सुबह 4 बजे की जाती है। मणिमंदिर में होने वाली भस्म आरती में गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़ियों को जलाकर तैयार की गई भस्म का इस्तेमाल किया जाता है। मान्यता के अनुसार भस्म आरती देखना महिलाओं के लिए निषेध है। इसलिए कुछ देर के लिए आरती के समय उनको घूंघट करना पड़ता है।
होती हैं पांच आरती
मणिमंदिर में पांच आरती का आयोजन किया जाता है। भोर में चार बजे से भस्म आरती के बाद बाल भोग आरती, राग भोग आरती, सायं और शयन आरती होती है।
सती की राख को शिव ने लपेटी थी भस्म
धर्मसंघ पीठाधीश्वर स्वामी शंकर देव चैतन्य ब्रह्मचारी महाराज ने बताया कि शिवपुराण में बताया गया है कि जब सती ने शिव के अपमान के कारण दक्ष के यज्ञ में स्वयं को भस्म कर दिया तो भगवान शिव क्रोधित हो गए और अपनी चेतना में नहीं रहे। इसके बाद वो माता सती के मृत शरीर को लेकर इधर-उधर घूमने लगे। जब भगवान शिव को श्रीहरि ने देखा तो उन्हें संसार की चिंता सताने लगी। हल निकालने के लिए उन्होंने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र से कई हिस्सों में बांट दिया था। जहां-जहां माता सती के अंग गिरे वो स्थान शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हो गए। भगवान शिव को लगा कि कहीं वो सती का हमेशा के लिए ना खो दें, इसलिए उन्होंने उनके भस्म को अपने शरीर पर लगा लिया।