जसवंत राठौर, पूरब जेठवा, अफरीना फातिमा और महक
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सेना की वर्दी से मिली प्रेरणा, चार साल की उम्र से शुरू हुई मेहनत, बर्फीले लद्दाख से काशी तक का सफर और छोटे गांवों से राष्ट्रीय मंच तक पहुंचने का संघर्ष...। 72वीं सीनियर नेशनल वॉलीबॉल चैंपियनशिप में उतरे खिलाड़ी सिर्फ मुकाबला नहीं खेल रहे, बल्कि अपने परिवार, अनुशासन और सपनों की कहानी भी लिख रहे हैं। किसी को पिता और भाई का सहारा मिला, तो किसी ने बेहद कम उम्र में खेल को जीवन बना लिया। इन सभी की मंजिल एक है। राष्ट्रीय मंच पर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन। ऐसे कई खिलाड़ियों से अमर उजाला टीम ने बात की।
पिता सेना में, वहीं से मिली खेल की प्रेरणा
आज के समय में अधिकांश युवाओं का रुझान क्रिकेट, हॉकी और बैडमिंटन की ओर है। पिता भारतीय सेना में कार्यरत हैं और बड़े भाई भी खेल क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। पिता ने वॉलीबॉल खेलने के लिए प्रेरित किया और शुरू से ही पूरा सहयोग दिया, जिसकी बदौलत आज मैं इस मुकाम पर हूं।
-पूरब जेठवा, अंडमान
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चार साल की उम्र से खेल रहीं वॉलीबॉल
मुझे बचपन से वॉलीबॉल खेल ने आकर्षित किया। यही वजह है कि मैंने चार साल की उम्र से वॉलीबॉल खेलना शुरू कर दिया था। किसी भी खेल से हमें यही सीखने को मिलता है कि जीवन में कैसे एक साथ अनुशासन में चलना चाहिए।
-महक, चंडीगढ़