मां कूष्मांडा के दरबार में संगीत समारोह की अंतिम निशान में संगीत के त्रिवेणी की रसधार में श्रोता रातभर गोता लगाते रहे। बृहस्पतिवार को अंतिम निशा में गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी प्रवाहमान रही। एक तरफ माता का भव्य दरबार सजा तो दूसरी ओर कलासाधकों ने सुरों के साज सजाए।
बृहस्पतिवार को छठीं निशा में शास्त्रीय गायिका तेजस्विनी डी वेर्णकर ने सबसे पहले राग श्री में विलंबित ताल में सांझ भयी तुम आओ...के बाद एक तराना एवं अंत में भजन जय दुर्गे दुर्गति परिहारिणी... प्रस्तुत किया। वादन में अतुल शंकर एवं संगीत मिश्र की बांसुरी और सारंगी की जुगलबंदी रही। उन्होंने सबसे पहले राग लतांगी में झप एवं तीन ताल में निबद्ध रचना सुनाई। उसके बाद कजरी घटा घेर आयी सावन की बदरिया... की धुन बजाकर सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। तबले पर पंडित ललित कुमार, पखावज पर आदित्यदीप एवं बांसुरी पर आरुष शंकर ने संगत की।
महोत्सव में पूनम सैनी एवं प्रसन्न वदना के भरतनाट्यम की प्रस्तुति मनमोहक रही। इसके पहले शानीष ज्ञावली ने बांसुरी वादन किया। तबले पर पंकज राय एवं पखावज पर आदित्य दीप ने संगत की। इसके अलावा प्रियांशु घोष, पंडित आनंद किशोर मिश्रा का शास्त्रीय गायन, ऋतुराज कात्यायन का गायन, हरिशंकर की बांसुरी एवं चैतन्य मंगलम के कथक के साथ संगीत समारोह ने विराम लिया।
संयोजन पंडित पशुपतिनाथ दुबे और संचालन सोनू झा ने किया। अंतिम दिन मां कूष्मांडा का विशिष्ट शृंगार हुआ। मां का बनारसी साड़ी के साथ-साथ गुलाब की पंखुड़ियों से शृंगार हुआ। शृंगार एवं आरती पंडित संजय दुबे ने उतारी। व्यवस्था महंत राजनाथ दुबे, कौशलपति द्विवेदी एवं विकास दुबे ने संभाली। भंडारे में श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। सांसद मनोज तिवारी भी माता के दरबार में दर्शन पूजन करने पहुंचे।