ये दो महान कला साधक अलग-अलग घाटों का भ्रमण कर अनेकों स्केच बनाते रहे। रामकुमार की घाट श्रृंखला ने काफी प्रसिद्धि पाई तो हुसैन के चित्रों क्रमश: द थ्री मैसेज, माया सीरीज, सेरीग्राफ आफ बनारस, त्रिभंग ने अपनी अलग ही पहचान बनाई।
द बाथर शीर्षक से बने चित्र में हुसैन ने बोल्ड लाइंस और अनूठे रंग-संयोजन के साथ कहीं उदास तो कही चटक रंगों में काशी के उल्लास को व्यक्त किया है। शांत नीला, धूसर तथा चटक भूरे रंगों में बनारस और उसकी आध्यामिकता को अपनी तूलिका से जीवंत कर दिया है। कृतियों में स्नान, ध्यान व पूजा व पवित्रता प्रेरणा बनीं।
एमएफ हुसैन की पेंटिंग बनातीं डॉ उत्तमा दीक्षित।
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त्रिभंग नामक शीर्षक से बने चित्र तीन शहरों, दिल्ली, बनारस और कोलकाता को दर्शाते हैं। ऊपर व नीचे क्रमश: दिल्ली व बनारस हैं। इस चित्र के जरिए उन्होंने राष्ट्रवाद, आध्यात्म और सक्रियता को दर्शाया है। चित्र में एक तरफ विवेकानंद का वैदिक दर्शन, ऊपर हनुमान घाट के मंदिर व गहरे लाल आसमान में उड़ते हुए हनुमान जी चित्रित हैं। बीच मे गंगा की अविरल बहती धारा, जिसमे कुछ महिलाएं पवित्र डुबकी लगा रहीं हैं तो कुछ नीचे घाट पर छतरियों के नीचे बैठे पंडा बैठे हैं। सबसे नीचे भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई बजाते हुए चित्रित हैं।
फिदा साहब और रामकुमार के काशी प्रेम के बारे में श्रीमती दीक्षित आगे बताती हैं कि दोनों बनारस शहर की गहराइयों से प्रभावित थे। इसीलिए उन्होंने दोबारा 1974 व 2002 में भी काशी की यात्रा की। हुसैन की बनारस यात्रा ने उन्हें यह निर्णय लेने का अधिकार दिया कि वह जैसा वह चित्रण करना चाहते थे, इस बात पर बिना ध्यान दिए कि दूसरे लोग क्या सोचेंगे या क्या अनुभव करेंगे और उनके बारे में क्या धारणा बनाएंगे को दरकिनार कर दिया। हुसैन को तरह-तरह की आलोचनाओं का सामना करने की ताकत भी बनारस शहर से मिली।