पढ़ाई व शोध के लिए आईएमएस बीएचयू में जो शव रखे जाते हैं, उन्हें इंबार्म किया जाता है। शवों में केमिकल फार्मालीन को इंजेक्ट करते हैं। इससे शव खराब नहीं होते हैं। जब कभी शव बाहर भेजने होते हैं, तब भी इसी केमिकल का इस्तेमाल होता है। शव की इंबाड्री करते हैं। इससे शव एक से दो साल तक खराब नहीं होता है। शव को केमिकल में डूबोकर रखा जाता है ताकि जब जरूरत हो तो उसका उपयोग किया जा सके। हर शव के लिए अलग बॉक्स बनता है।
पहले 72 घंटे डीप फ्रीजर में रखा जाता है शव
उप प्राचार्य प्रोफेसर डॉ नीरज पांडेय ने कहर कि किसी भी शव को नियमानुसार प्राप्त करने के बाद उसे डीप फ्रीजर में 72 घंटे तक रखा जाता है। बाद में सड़न से बचाने के लिए शव को दस लीटर केमिकल में डूबोकर रखा जाता है।
एनाटमी डिपार्टमेंट में अंगदान के लिए भी लोग आते हैं। अब 300 से ज्यादा लोगों ने अंगदान का फार्म भरा है। जो फार्म भरे जाते हैं, उस पर दो लोगों की गवाही भी होती है। हालांकि, जो फार्म भरते हैं, उनसे जुड़े लोग डिपार्टमेंट तक नहीं पहुंचते हैं। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि मृत्यु के बाद ही शव मिलते हैं। कई मामले ऐसे होते हैं, जिसमें अंगदान करने वाले व्यक्ति के परिजनों को जानकारी ही नहीं होती है। हाल फिलहाल में अंगदान से संबंधित लोगों के शव मिलने का कोई मामला सामने नहीं आया है।
आजमगढ़ के चक्रपानपुर स्थित मेडिकल कॉलेज के छात्रों की पढ़ाई उधार के शवों के भरोसे हैं। आईएमएस बीएचयू से शव भेजा जाता है, फिर छात्र-छात्राएं पढ़ाई करते हैं। वरिष्ठ डॉक्टर शोध को आगे बढ़ाते हैं। देहदान का कोई मामला अब तक सामने नहीं आया है। एमबीबीएस के 100 छात्र-छात्राएं मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। प्राचार्य डाॅ. आरपी शर्मा के मुताबिक बीएचयू से शव मिल जा रहे हैं। इससे दिक्कत नहीं आ रही है। हाल में जिलाधिकारी ने सोसायटी गठन करने का निर्देश दिया है। इसका गठन जल्द किया जाएगा। सोसायटी लोगों से संपर्क करके देहदान का संकल्प दिलाएगी। इससे बच्चों की पढ़ाई आसान होगी। लावारिस शवों को भी लिया जाएगा। इसकी व्यवस्था की जा रही है।
गाजीपुर मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के पहले बैच में सौ छात्र-छात्राएं हैं। उप प्राचार्य प्रोफेसर डॉ नीरज पांडेय बताते हैं कि जिला व पुलिस प्रशासन की मदद से दस लावारिश शव मिले हैं। अब तक एक देहदानी का पार्थिव शरीर मिला है।
मनिहारी ब्लॉक के खड़वा गांव के रहने वाले समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे के पिता मार्कंडेय दुबे ने करीब 15 वर्ष पहले अपने शरीर को मेडिकल कॉलेज के छात्रों के पठन-पाठन के लिए देहदान करने का संकल्प लिया था। इसे उनके निधन होने के बाद बेटे व समाजसेवी ब्रजभूषण दूबे ने पूरा किया था। इससे पहले ब्रजभूषण दूबे की माता का पार्थिव शरीर बीएचयू को दान दिया गया था।